रोहडू के शराचली क्षेत्र के पुजारली गांव में करीब तीन सौ साल पुराने मंदिर के स्थान पर नव निर्मित देवता बनाड के मंदिर के शिखा पूजन के साथ वीरवार को प्राण प्रतिष्ठा की मुख्य रस्म पूरी की गई। धार्मिक अनुष्ठान में हजारों लोग उपस्थित हुए हैं। पूरा मैदान दिन भर देवताओं के जयकारों से गूंजता रहा। वीरवार सुबह करीब नौ बजे पारंपरिक वाद्य यंत्रों के साथ शिखा पूजन की रस्म शुरू हुई।
देवता देशमोली की पालकी, देवता क्यांलू महाराज मंदिर के बाद तंबू से मुख्य रस्म के लिए बाहर निकले। उसके बाद पुजारी, वजीर सहित अन्य लोग मंदिर की छत पर कलश चढ़ाने और ध्वजारोहण के लिए पहुंचे। करीब एक घंटे की इस रस्म को देखने के लिए हजारों लोग मंदिर में उपस्थित रहे। कलश की स्थापना और ध्वजारोहण की रस्म पूरी होते ही पूरा मैदान देवता बनाड, देवता क्यांलू व देवता देशमोली के नारों से गूंज उठा। शिखा पजन का कार्यक्रम पूरा होने के बाद मंदिर के बाहर मैदान में लोगों के लिए भंडारा शुरू किया गया।
देवता की ओर से आयोजित की गई धाम में सभी लोगों ने भोजन गहण किया। देवता बनाड मंदिर कमेटी के सभी सदस्यों, देवता के बजीर चतर सिंह काल्टा सहित सभी कारदारों ने कार्यक्रम के सफल आयोजन और मंदिर निर्माण में सहयोग के लिए सभी लोगों का आभार व्यक्त किया है। उन्होंने कहा कि देवता के आशीर्वाद और लोगों के सहयोग से इस अनुष्ठान की मुख्य रस्म पूरी हो गई है।
कल तक चलेगा यह कार्यक्रम
मंदिर में बारह दिसंबर को इस अनुष्ठान का आयोजन चलता रहेगा। 9 दिसंबर को देवता बनाड देवता देशमोली का पालकी ढाडी गांव से पुजारली पहुंची। देवता क्यालू महाराज मंदिर निमार्ण शुरू होने के समय से पुजारली में ही थे। 10 दिसंबर को शिखा पूजन और मुख्य धाम का आयोजन मुख्य रस्म पूरी की गई। 11 दिसंबर को मंदिर में ब्राह्मण भोज का आयोजन होगा। 12 दिसंबर को रोहटान गांव में देवता क्यांलू महाराज के ऐतिहासिक मंदिर में धाम का आयोजन होगा।
तीनों देवताओं को नहीं चढ़ाई जाती है बलि
शराचली और जुब्बल तहसील के कई गांवों के लोगों की देवता बनाड के लिए अटूट आस्था है। तीनों देवताओं के पास कोई बलि नहीं चढ़ती है। पूरे क्षेत्र में अनुष्ठान के दौरान सादा भोजन पकता है। अनुष्ठान की मुख्य रस्म शिखा पूजन के दौरान देवता बनाड की पालकी तंबू से बाहर नहीं निकलती है। शिखा पूजन की रस्म शुरू होते हैं देवता देशमोली और क्यांलू देवता ही बाहर रहते हैं।
पुरानी काष्ठ कला का नमूना पेश किया है नए मंदिर में
करीब तीन सौ साल पुराने मंदिर को तोड़ने के बाद नया मंदिर पुरानी शैली में तैयार किया गया है। मंदिर के बाहर और अंदर लकड़ी में महाभारत, रामायण के चित्रों को उकेरा गया है। मंदिर में की गई नक्काशी ग्रंथों के उपदेशों को जीवंत बनाती है।