उनकी देखादेखी में मैं भी उन्हें ऐसे ही पुकारता था। ‘बाप जी’ कहते ही उनके चेहरे पर मुस्कराहट छा जाती थी। सुखराम ने कहा कि जब भी मुझे कोई समस्या होती, मेरे चेहरे पर शिकन देख मुझसे पूछते थे कि क्या बात है।
किसी न किसी बहाने से कभी पैसे तो कभी उपहार मुझे या मेरे परिवार के सदस्यों को देकर मदद कर देते थे। आसपास के लोगों का हाल भी मुझसे पूछते रहते थे। उनके निधन से ऐसा लग रहा है जैसे मेरे सिर से पिता का साया उठ गया हो।
सुखराम ने बताया कि दीदी नमिता और उनके परिवार ने बताया था कि वे 15 जून को प्रीणी आएंगे, लेकिन 11 जून को ही अटल की तबीयत और ज्यादा खराब होने के कारण वे नहीं आ सके थे।
अटल के गांव प्रीणी में दूसरे दिन भले ही ग्रामीणों ने चूल्हा जलाया और एक समय का खाना बनाया, लेकिन ग्रामीणों के हलक से एक निवाला नहीं उतरा। शुक्रवार को प्रीणी में दिनभर सन्नाटा छाया रहा।
जनप्रतिनिधियों और लोगों ने मेला ग्राउंड में 12 साल पहले उनके लगाए देवदार के पेड़ के पास एकत्रित होकर रोते-बिलखते उनके चित्र पर पुष्प अर्पित कर उन्हें श्रद्धांजलि दी। साथ ही पेड़ की देखभाल करने का संकल्प लिया। अटल के निधन के चलते शाउणी मेला भी नहीं मनाने का निर्णय लिया गया।
गांव की 70 वर्षीय हिमी देवी और 80 वर्षीय तेजी देवी ने कहा कि ऐसा लग रहा है जैसे घर का मुखिया हमें छोड़ कर चला गया है। पूर्व प्रधानमंत्री जब भी गांव आते थे तो कुल्लवी धाम चखना नहीं भूलते थे।
प्रीणी महिला मंडल की प्रधान मणी देवी, उपप्रधान गोदावरी, निर्मला देवी, अंजु देवी, देई, खिमी देवी, आमरा देवी ने कहा कि भगवान ने उनका मार्गदर्शक छीन लिया है।