साइबर ठगी में पैसा गंवाने के बाद सबसे बड़ी उम्मीद यही रहती है कि किसी तरह रकम वापस मिल जाए। पीड़ित पुलिस, बैंक या साइबर विशेषज्ञ से मदद की उम्मीद करता है। लेकिन अब यही उम्मीद साइबर अपराधियों के लिए ठगी का नया हथियार बनती जा रही है। ठगी के बाद पीड़ित को राहत देने के बजाय कुछ साइबर अपराधी उसे दूसरी बार अपने जाल में फंसाने की कोशिश कर रहे हैं। इसके लिए पहले से ठगी का शिकार हुए लोगों की जानकारी जुटाई जाती है और फिर फोन कॉल, मैसेज या ऑनलाइन माध्यम से संपर्क किया जाता है।
ठग खुद को पुलिस अधिकारी, साइबर सेल का कर्मचारी, बैंक अधिकारी, वकील या निजी रिकवरी एजेंट बताकर भरोसा जीतने की कोशिश करते हैं। इसके बाद दावा किया जाता है कि पीड़ित की फंसी हुई रकम वापस दिलाई जा सकती है। लेकिन इसके लिए पहले प्रोसेसिंग फीस, टैक्स, कानूनी खर्च, सत्यापन शुल्क या अन्य नाम पर रकम मांगी जाती है।
पहली ठगी की जानकारी बताकर जीतते हैं भरोसा
इस पूरे खेल में साइबर अपराधियों की सबसे खतरनाक चाल यह है कि वे पीड़ित को उसकी पहली ठगी से जुड़ी कुछ जानकारी बताकर विश्वास पैदा करने की कोशिश करते हैं। उन्हें पता होता है कि पीड़ित ने कितनी रकम गंवाई, कब लेनदेन हुआ या उसने शिकायत कहां की। ऐसी जानकारी सुनकर पीड़ित को लग सकता है कि फोन करने वाले व्यक्ति को वास्तव में उसके मामले की जानकारी है। यहीं से दूसरी ठगी का रास्ता खुलता है। पीड़ित से कहा जा सकता है कि रकम वापस करने की प्रक्रिया शुरू हो गई है और इसके लिए कुछ दस्तावेज, बैंक संबंधी जानकारी या शुल्क जमा करना जरूरी है।
पुलिस अधिकारी बनकर भी कर सकते हैं संपर्क
साइबर अपराधी केवल रिकवरी एजेंट बनकर ही संपर्क नहीं करते। वे खुद को सरकारी अधिकारी या पुलिस से जुड़ा व्यक्ति बताकर भी पीड़ित को प्रभावित कर सकते हैं। कभी बैंक खाता सत्यापित करने के नाम पर जानकारी मांगी जा सकती है तो कभी किसी लिंक पर क्लिक करके प्रक्रिया पूरी करने को कहा जा सकता है। सबसे बड़ा खतरा तब होता है जब पीड़ित से ओटीपी, यूपीआई पिन, पासवर्ड या बैंकिंग जानकारी मांगी जाए। कुछ मामलों में मोबाइल या कंप्यूटर का रिमोट एक्सेस लेने की कोशिश भी की जा सकती है। ऐसी स्थिति में रकम वापस मिलने के बजाय खाते से दोबारा पैसा निकलने का खतरा रहता है।
रकम वापस दिलाने वाले से भी रहें सतर्क
अगर साइबर ठगी के बाद कोई व्यक्ति खुद संपर्क करके कहता है कि वह आपकी रकम वापस दिला सकता है तो तुरंत भरोसा न करें। पहले उसकी पहचान की स्वतंत्र रूप से पुष्टि करें। यह पता करें कि वह किस संस्था से जुड़ा है और उससे संपर्क करने का आधिकारिक माध्यम क्या है। अगर कोई व्यक्ति किसी निजी बैंक खाते में पैसा जमा कराने, लिंक खोलने या तत्काल भुगतान करने का दबाव बनाता है तो इसे गंभीर चेतावनी संकेत मानना चाहिए।
ठगी के बाद क्या करें?
अगर आपके साथ वित्तीय साइबर ठगी हुई है तो सबसे जरूरी है कि समय बर्बाद न करें। 1930 हेल्पलाइन पर तत्काल शिकायत करें और राष्ट्रीय साइबर अपराध रिपोर्टिंग पोर्टल पर भी शिकायत दर्ज करें। बैंक लेनदेन से संबंधित यूटीआर नंबर, ट्रांजेक्शन विवरण, मोबाइल नंबर, चैट, स्क्रीनशॉट और अन्य डिजिटल सबूत सुरक्षित रखें। किसी संदिग्ध मोबाइल नंबर, यूआरएल या ईमेल की जानकारी भी संबंधित साइबर शिकायत व्यवस्था में रिपोर्ट की जा सकती है। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि ठगी के बाद दोबारा संपर्क करने वाले व्यक्ति को केवल इसलिए असली न मानें क्योंकि उसके पास आपकी पुरानी शिकायत या लेनदेन से जुड़ी जानकारी है।
अप्रैल 2026 से मनी रेस्टोरेशन मॉड्यूल
वित्तीय साइबर ठगी के मामलों में शिकायत और रकम की वापसी की प्रक्रिया को मजबूत करने के लिए अप्रैल 2026 से मनी रेस्टोरेशन मॉड्यूल सक्रिय किया गया है। इसलिए पीड़ितों को किसी निजी व्यक्ति या कथित रिकवरी एजेंट को पैसे देने के बजाय अधिकृत सरकारी व्यवस्था के माध्यम से शिकायत करनी चाहिए।
अतिरिक्त पुलिस अधीक्षक एवं साइबर विशेषज्ञ नरवीर सिंह राठौर ने लोगों को सतर्क रहने की सलाह दी है। उनका कहना है कि साइबर ठग पहले जिस व्यक्ति को निशाना बनाते हैं, उसी को बाद में मदद के नाम पर दोबारा ठगी का शिकार बनाने की कोशिश कर सकते हैं। यानी साइबर ठगी के बाद मामला खत्म नहीं हो जाता। रकम वापस दिलाने के नाम पर आने वाली हर कॉल भी एक संभावित खतरे का संकेत हो सकती है।