अदालत ने पाया कि अभियोजन पक्ष पीड़िता की वास्तविक उम्र 18 वर्ष से कम साबित करने में पूरी तरह नाकाम रहा है। सरकारी दस्तावेजों में पीड़िता की जन्मतिथि 15 जनवरी 2010 दर्ज थी जिसके आधार पर उसे घटना के समय 15 वर्ष का नाबालिग माना गया था। अदालत में सुनवाई के दौरान पीड़िता और उसके पिता बयानों से पलट गए थे। पीड़िता ने गवाही दी कि उसका वास्तविक जन्म 26 जनवरी 2006 को हुआ था और शादी के समय वह बालिग थी। पीड़िता और उसके पिता ने अदालत को बताया कि पीड़िता के दादा अनपढ़ थे जिस कारण उन्होंने पंचायत रिकॉर्ड में गलत जन्मतिथि दर्ज करवा दी थी। इस गलती की वजह से स्कूल रिकॉर्ड और आधार कार्ड में भी उम्र गलत दर्ज हो गई।
अभियोजन पक्ष के अनुसार पीड़िता साल 2023 में फेसबुक के जरिये आरोपी के संपर्क में आई थी। इसके बाद वह मिले और पति-पत्नी की तरह रहने लगे। इस दौरान पीड़िता गर्भवती हो गई थी। पीड़िता जब अस्पताल गई तो डॉक्टरों ने उसके आधार कार्ड के अनुसार उसके नाबालिग होने का पता चला और उन्होंने पुलिस को सूचित किया था। पुलिस ने मामला दर्ज कर आरोपी को गिरफ्तार कर लिया था। अदालत ने टिप्पणी की कि इस मामले में पीड़िता और उसके पिता के बयानों ने आधिकारिक रिकॉर्ड की सत्यता पर गंभीर संदेह पैदा कर दिया है। अदालत ने इन्हीं तथ्यों को ध्यान में रखते हुए आरोपी को बरी कर दिया है।