मुख्यमंत्री ने कहा कि हिमाचल प्रदेश जैसे छोटे से राज्य ने विभिन्न जल विद्युत परियोजनाओं के निर्माण के लिए राष्ट्र हित में बहुत बड़ा योगदान दिया, लेकिन इन पर बने बांधों से प्रदेश में काफी लोगों को विस्थापित भी होना पड़ा। भाखड़ा बांध तथा पौंग बांध के कारण विस्थापित हुए लोग अभी भी समुचित हक से वंचित हैं। उन्होंने कहा कि वर्तमान सरकार इनके अधिकारों को वापस दिलाने के लिए हर संभव प्रयास करेगी। सुक्खू ने कहा कि यह दुख की बात है कि हिमाचल सरकार को अपने हिस्से की बिजली लेने के लिए भी सर्वोच्च न्यायालय में जाना पड़ा है।
उन्होंने कहा कि बांधों के जलाशय में पानी के भराव से प्रदेश में जहां खुशहाली भी आती है, बरसात में बाढ़ के दौरान अगर कहीं ज्यादा पानी छोड़ना पड़ गया तो बांध के नीचे की ओर रहने वाले लोगों को परेशानी का सामना करना पड़ता है। इस समस्या से निपटने के लिए हमें बांधों की सुरक्षा पर विशेष रूप से ध्यान देने की आवश्यकता है। हमें भविष्य की प्राकृतिक आपदाओं के लिए पहले ही सचेत और पूर्ण रूप से तैयार रहना है क्योंकि हम वर्ष 2023 में भी हिमाचल की सबसे बड़ी प्राकृतिक आपदा का दर्द झेल चुके हैं। उन्होंने कहा कि बांध बनने के बाद हिमाचल प्रदेश में बादल फटने की घटनाएं बढ़ी हैं। उन्होंने बांध प्राधिकरण को निर्देश दिए कि बांध से पानी छोड़ने से पहले इसके नीचे के क्षेत्रों में रहने वाले लोगों को अलर्ट किया जाए। सुक्खू ने बांधों के निर्माण में गुणवत्ता के साथ इनकी आयु बढ़ाने और उनकी सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए रखरखाव और सरंचनात्मक अखंडता की आवश्यकता पर बल दिया।
जलवायु परिवर्तन और अन्य कारण हिमालय क्षेत्र में बांध सुरक्षा के लिए नई चुनौतियां पेश करते हैं व इस पर हमें बहुआयामी दृष्टिकोण अपनाना चाहिए। उन्होंने अभियंताओं से कहा कि प्रदेश में भी बांध सुरक्षा प्रावधानों को लागू किया गया है। राज्य में बने बांधों की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए राज्य सरकार ने बांध सुरक्षा समिति का गठन किया है जो सभी बांधों के रखरखाव व सुरक्षा का अनुश्रवण करती हैं। इस अवसर पर राजस्व मंत्री जगत सिंह नेगी, शिक्षा मंत्री रोहित ठाकुर, तकनीकी शिक्षा मंत्री राजेश धर्माणी, मुख्य सचिव प्रबोध सक्सेना, हिमाचल प्रदेश विद्युत नियामक आयोग के अध्यक्ष डीके शर्मा तथा डैम सेफ्टी सोसयटी के पदाधिकारी सहित अन्य अधिकारी व कर्मचारी उपस्थित थे।