यही नहीं, गोमूत्र आधारित उद्योगों को बढ़ावा देने के लिए पचास प्रतिशत निवेश अनुदान की बात कही। हिमाचल प्रदेश धार्मिक संस्थान तथा मंदिर न्यास अधिनियम में संशोधन कर चढ़ावे का पंद्रह प्रतिशत गो सदनों के निर्माण, रखरखाव व परिचालन के लिए रखने की बात कही।
शराब की हर बोतल पर एक रुपये के हिसाब से गोवंश विकास सेस, पशुओं के पंजीकरण व टैगिंग की व्यवस्था की गई। यही नहीं गोसदनों के पंजीकृत पशुओं के लिए गांव की सार्वजनिक चरागाहों की पहचान करने और एक रुपये पर गोसदन स्थापित करने के लिए जमीन देने की बात भी कही।
इसके अलावा गोसेवा के लिहाज से सर्वोत्तम पंचायत के लिए दस लाख का पुरस्कार जैसी कई लोक लुभावन योजनाएं की। लेकिन साल भर बात भी सरकार की ज्यादातर लोक लुभावन योजनाएं एलान से आगे नहीं बढ़ सकी हैं।
प्रदेश सरकार के आदेश के बावजूद साल भर बाद भी जिलों के उपायुक्त गोसदन स्थापित करने के लिए अपने जिलों में जमीनें तक चिह्नित नहीं कर सके। यही नहीं, बिलासपुर में एम्स के लिए जो जमीन चिह्नित की गई, उसकी वजह से एक गोवंशीय पशु ब्रीडिंग फार्म जरूर निशाने पर आ गया।
खास बात यह है कि एम्स जैसे जनता से जुड़े संस्थान के लिए गायों को बेघर किया गया लेकिन उनके लिए भी जमीन नहीं मिल सकी और आखिर पशुपालन विभाग ने जयराम सरकार के ही राज में गायों की नीलामी की प्रक्रिया शुरू कर दी।
अंतिम सत्र में लाए गोसेवा आयोग का बिल
साल भर तक गायों के नाम पर कुछ न कर पाने वाली सरकार के पास सिर्फ गो सेवा आयोग का बिल विधानसभा की दूसरे शीत सत्र में पास कराने की उपलब्धि है। यह बिल भी साल के अंतिम दिनों में पास हो पाया जो अभी भी नोटिफाई नहीं हो सका है। जाहिर है, सरकार सिर्फ एक कदम इस मामले में चल पाई लेकिन वह भी पूरा नहीं हो सका है।