केंद्रीय विश्वविद्यालय में चार शोधार्थी पीएचडी कर रहे हैं, जिनमें से दो शोधार्थियों का विषय जम्मू कश्मीर में मीडिया केंद्रित युद्ध प्रणाली पर है। एक शोधार्थी वहां के तीर्थ स्थलों और वहां जाने वाले रास्तों पर शोध कर रहा है, ताकि विलुप्त हो चुके आस्था केंद्रों और वहां तक पहुंचने के रास्तों को पुन: मानचित्र पर लाया जा सके।
हिमाचल प्रदेश केंद्रीय विश्वविद्यालय कश्मीर घाटी की विलुप्त हो रही शारदा लिपि को संजो रहा है। सीयू में शारदा लिपि को जीवंत रखने के लिए सर्टिफिकेट कोर्स करवाया जा रहा है। इसमें 33 छात्र-छात्राएं अलग-अलग सत्रों में सर्टिफिकेट कोर्स कर शारदा लिपि को संजोने का प्रयास कर रहे हैं। कश्मीर स्टडी के निदेशक डॉ. मलकीत सिंह ने बताया कि केंद्रीय विवि में एमए इन जम्मू-कश्मीर स्टडी में करवाई जा रही है।
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इसके अलावा केंद्रीय विश्वविद्यालय में चार शोधार्थी पीएचडी कर रहे हैं, जिनमें से दो शोधार्थियों का विषय जम्मू कश्मीर में मीडिया केंद्रित युद्ध प्रणाली पर है। एक शोधार्थी वहां के तीर्थ स्थलों और वहां जाने वाले रास्तों पर शोध कर रहा है, ताकि विलुप्त हो चुके आस्था केंद्रों और वहां तक पहुंचने के रास्तों को पुन: मानचित्र पर लाया जा सके। वहीं एक शोधार्थी अनुसूचित जातियों पर धारा 370 के पड़ने वाले प्रभावों पर शोध कर रहा है, जबकि राजधानी शिमला से संबंध रखने वाला एक शोधार्थी कश्मीर की आतंकी विचारधारा पर एमफिल को जमा करवा चुका है।
उन्होंने बताया कि शारदा लिपि को बढ़ावा देने के लिए संजीवनी शारदा केंद्र जम्मू और केंद्रीय विश्वविद्यालय हिमाचल प्रदेश मिलकर कार्य कर रहे हैं। इसके चलते भारतीय भाषाओं के प्रचार के तहत शारदा लिपि को पुनर्जीवित करने और बढ़ावा देने में आसानी होगी। गौर रहे कि कश्मीरी भाषा की मूल लिपि शारदा है। मौजूदा समय में वहां से विलुप्त मानी जा रही है।
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क्या है शारदा लिपि
शारदा लिपि पश्चिमी ब्राह्मी लिपि से नौवीं शताब्दी में उत्पन्न हुई। कुछ पुराने पंडित मौजूदा समय में इसका उपयोग करते हैं। हिमाचल प्रदेश में यह लिपि 13वीं सदी तक प्रयोग में आती थी और फल-फूल रही थी। शारदा वर्णमाला ओम् स्वस्ति सिद्धम से आरंभ की जाती है। कश्मीर देश की अधिष्ठात्री देवी शारदा मानी जाती है, जिससे वह देश शारदादेश या शारद मंडल कहलाता है और इसी से वहां की लिपि को शारदा लिपि कहते हैं।