हिमाचल प्रदेश के आठ विभागों ने वित्तीय वर्ष 2015 से लेकर 2021 तक बिना उपयोगिता प्रमाणपत्र पेश किए ही 3557.83 करोड़ रुपये खर्च कर दिए। प्रमाणपत्र पेश किए बिना खर्च की गई राशि पर भारत के नियंत्रक एवं लेखा परीक्षक (कैग) ने सवाल खड़े किए हैं। मुख्यमंत्री जयराम ठाकुर ने शनिवार को विधानसभा के मानसून सत्र के अंतिम दिन सदन में कैग की रिपोर्ट पेश की। इसमें वित्तीय वर्ष 2020-21 के वित्त लेखे पेश किए गए। कैग की रिपोर्ट में खुलासा हुआ है कि विभागों ने 2,799 उपयोगिता प्रमाणपत्र प्रस्तुत नहीं किए। कैग ने कहा है कि वित्तीय वर्ष 2015-16 में 24, 2016-17 में 152, 2017-18 में 397, 2018-19 में 914 और 2019-20 में 1312 उपयोगिता प्रमाणपत्र पेश नहीं किए। वित्तीय वर्ष 2015-16 में 34.86, 2016-17 में 139.08, 2017-18 में 410.48, 2018-19 में 1002.65 और 2019-20 में 1970.76 करोड़ रुपये खर्च किए गए।
कैग ने आशंका जताते हुए टिप्पणी की है कि उपयोगिता प्रमाणपत्रों को प्रस्तुत नहीं करने का अर्थ है कि खर्च की गई राशि का प्राधिकारियों ने स्पष्टीकरण नहीं दिया। उपयोगिता प्रमाणपत्रों के प्रस्तुत न करने से राशि के दुरुपयोग का खतरा रहता है। इसलिए यह जरूरी है कि राज्य सरकार हर पहलू की बारीकी से निगरानी करे और उपयोगिता प्रमाणपत्रों के समयबद्ध प्रस्तुतीकरण के लिए जिम्मेवार संबंधित व्यक्तियों पर दबाव बनाए। इनमें से सबसे ज्यादा बजट 1,269.55 करोड़ रुपये पंचायती राज, 745.69 करोड़ विकास और 454.98 करोड़ रुपये शहरी विकास विभाग से संबंधित है। बाकी राशि आयुष, शिक्षा, कृषि एवं उद्यान, पशुपालन, उद्योग, जलशक्ति विभाग और राज्य लोक सेवा आयोग से संबंधित है।
आर्थिक विकास में योगदान नहीं दे रहे सार्वजनिक उद्यम
शिमला। हिमाचल प्रदेश के आर्थिक विकास में सार्वजनिक उद्यम योगदान नहीं द रहे हैं। कैग रिपोर्ट में इसको लेकर कड़ी टिप्पणी की गई है। रिपोर्ट में बताया गया है कि हिमाचल वर्स्टेड लिमिटेड कंपनी निष्क्रिय है। ये बीते तीन से 21 वर्षों से अकार्यशील हैं। इनमें 17.75 करोड़ रुपये का पूंजीगत और दीर्घावधि का 60.15 करोड़ रुपये का निवेश हुआ। कुल 77.90 करोड़ रुपये के निवेश के बावजूद आर्थिक विकास में योगदान नहीं दिया जाना चिंताजनक है। राज्य में चार विद्युत क्षेत्र के उद्यम और 25 अन्य सार्वजनिक क्षेत्र के उद्यम हैं। 28 उद्यमों की कुल परिसंपत्तियों का मूल्य उनके सकल कर्ज से अधिक है। वर्ष 2020-21 के दौरान राज्य के सार्वजनिक क्षेत्र के उद्यमों का कुल टर्नओवर 10,603 करोड़ रुपये रहा। प्रदेश के सकल घरेलू उत्पाद में उद्यमों के टर्नओवर का प्रतिशत सिर्फ 6.77 रहा। रिपोर्ट में बताया कि राज्य के सार्वजनिक क्षेत्र के उद्यमों में निवेशित सरकार की इक्विटी के विनिवेश के लिए कोई नीति तक नहीं बनाई गई है।
सात उद्यमों शिमला स्मार्ट सिटी लिमिटेड, नयनादेवी जी और श्री आनंदपुर साहिब रोपवे लिमिटेड, धर्मशाला स्मार्ट सिटी लिमिटेड, शिमला जल प्रबंधन लिमिटेड, सड़क एवं आधारभूत विकास निगम, रोपवे एंड रैपिड ट्रांसपोर्ट सिस्टम डेवलपमेंट कॉरपोरेशन और ब्यास वैली कॉरपोरेशन ने अपने प्रथम लेखे तैयार नहीं किए। कैग ने सुझाव दिए हैं कि राज्य सरकार प्रदेश सरकार के सार्वजनिक क्षेत्रों के उद्यमों की वित्तीय विवरणियों का समयबद्ध प्रस्तुतीकरण सुनिश्चित करे। सार्वजनिक क्षेत्र के अकार्यशील उद्यमों की परिसमापन प्रक्रिया शुरू करने या पूरी करने के संबंध में निर्णय लिए जाएं। राज्य सरकार लाभांश नीति के निर्देशों की अनुपालना के लिए लाभ अर्जित करने वाले प्रदेश के सार्वजनिक क्षेत्र के उद्यमों से लाभांश घोषित करने या इसकी अदायगी भी सुनिश्चित करे।
बिजली बोर्ड को हुई 185 करोड़ रुपये की हानि
वर्ष 2020-21 के दौरान बिजली बोर्ड को 185 करोड़ रुपये, एचआरटीसी को 146.43 करोड़ रुपये और पावर कारपोरेशन को 105.98 करोड़ रुपये की हानि हुई। राज्य के सार्वजनिक क्षेत्र के 13 उद्यमों में 4,074.85 करोड़ रुपये की संचित हानि पाई गई। चार उद्यमों बागवानी उत्पाद विपणन और प्रसंस्करण निगम, पर्यटन विकास निगम, राज्य हस्तशिल्प और हथकरघा निगम और राज्य इलेक्ट्रानिक कारपोरेशन ने 2.58 करोड़ रुपये का लाभांश सरकार को प्रदान नहीं किया।