समझौते में केंद्र सरकार ने भू-अधिग्रहण के लिए पैसा न दे पाने की बात की। महज 50-55 करोड़ रुपये देने पर ही केंद्र राजी है, जबकि खर्च सैकड़ों करोड़ रुपये में है। भानुपल्ली पंजाब में है जबकि यह बेस ट्रैक हिमाचल के भीतर बिलासपुर के बेरी तक बनना है। पंजाब के हिस्से में इसकी काफी कम लागत आ रही है।
इस प्रोजेक्ट की लागत का केंद्र 75 फीसदी पैसा ही देगा जबकि हिमाचल और पंजाब को 25 फीसदी लागत उठानी है। 63 किलोमीटर लंबे इस ट्रैक की वर्तमान में अनुमानित लागत 2967 करोड़ रुपये है। इसमें हिमाचल का कम से कम 700 करोड़ रुपये का खर्च आ रहा है, जो बढ़ भी सकता है।
अतिरिक्त मुख्य सचिव वित्त एवं योजना अनिल खाची ने बताया कि केंद्र सरकार को कह दिया गया है कि हिमाचल इतना खर्च उठाने की स्थिति में नहीं है। प्रदेश के दूसरे खर्चे बहुत हैं। बिलासपुर-किरतपुर फोरलेन बनने के बाद राज्य सरकार इस ट्रैक पर ज्यादा पैसा खर्च करने में समझदारी नहीं मान रही है। यह रेल लाइन तभी बन पाएगी, अगर केंद्र ही इसका अधिकांश खर्चा उठाए।
एक दशक बाद भी यह लाइन कागजों में ही है। भानुपल्ली-बिलासपुर-बेरी रेल लाइन को बनाने का फैसला आठ अगस्त 2007 को हुआ। उस वक्त इसकी कुल लागत 1,047 करोड़ रुपये तय हुई।
इसकी केंद्र और राज्य की हिस्सेदारी 75:25 के अनुपात से निश्चित हुई। यानी हिमाचल सरकार को तब 261.75 करोड़ खर्च करने थे। हाल ही में केंद्र सरकार ने भूमि अधिग्रहण की लागत का ज्यादातर बोझ हिमाचल पर डाल दिया है।
भानुपल्ली-बिलासपुर-बेरी से आगे सामरिक महत्व की बिलासपुर-मनाली-लेह रेल लाइन प्रस्तावित है। इस ब्रॉडगेज रेल लाइन की लंबाई 498 किलोमीटर होगी। यह दुनिया का सबसे ऊंचाई वाला रेल ट्रैक होगा जो चीन के शंघाई-तिब्बत रेल मार्ग का विश्व रिकॉर्ड तोड़ेगा।
जून 2017 को लेह में तत्कालीन रेल मंत्री सुरेश प्रभु ने इसका फाइनल लोकेशन सर्वे के लिए शिलान्यास रखा। इससे सीमा क्षेत्र तक सेना और सैन्य सामग्री को पहुंचाने में सहूलियत होनी है।