कोरोना काल में दिल्ली के बाबा का ढाबा चर्चा में रहा। इसी तरह हिमाचल के बिलासपुर जिले के बिनौला में बहादुर ढाबा भी इन दिनों खूब सुर्खियां बटोर रहा है। खास बात यह है कि इस ढाबे में विलुप्त हो रहे घराट के आटे से बनी मक्की की रोटी देसी घी के साथ परोसी जाती है। इसके साथ माह की दाल और कढ़ी भी खिलाई जाती है।
चूल्हे पर एक दिन में 350 से 400 रोटियां बनाई जाती हैं। लॉकडाउन के दौरान जहां सब जगह कारोबार मंदा रहा, लेकिन बनौला के बहादुर ढाबे में रोजाना 100 से ज्यादा लोग मक्की की रोटी का स्वाद चखने पहुंचते रहे। ढाबे में कोरोना काल में कमाई में मात्र 10 फीसदी की ही कमी आई है। चंडीगढ़-मनाली रामजार्ग पर बिलासपुर के बिनौला में रमेश चंद की दो पीढ़ियां पिछले 60 सालों से ढाबा चला रही हैं।
इस ढाबे में दिल्ली, चंडीगढ़, हरियाणा और पंजाब से आने वाले सैलानी खाना खाने के लिए रुकते हैं। प्रदेश के अन्य जिलों से आने वाले लोग भी बहादुर ढाबा पर देसी घी के साथ मक्की की रोटी का जायका लेना नहीं भूलते। जिले के कई लोग ढाबे से खाना पैक करवाकर घर ले जाते हैं।
ढाबा मालिक रमेश ने बताया कि वे दयोली में बने घराट से मक्की का आटा लाते हैं। चूल्हे पर रोटी बनाई जाती है। इसके लिए दो कारीगर रखे हैं। हर दिन 20 किलो माह की दाल और पांच किलो देसी घी की खपत होती है। ढाबे में 70 रुपये डाइट के लिए जाते हैं।
सर्दियों में पर्यटकों के लिए विशेष तौर पर मक्की की रोटी के साथ सरसों का साग परोसा जाता है। कहा कि सामान्य दिनों में ढाबे में रोजाना 40 किलो आटा लगता है। कोरोना काल में यह 10 फीसदी कम होकर 30 किलो पर आ गया है। अब लॉकडाउन खुलने के बाद इसमें बढ़ोतरी होने लगी है।