दुर्गा मां के साथ भैरव की होती है पूजा
पूजा के लिए जंगल से लाते हैं धराड़ी के फूल
संवाद न्यूज एजेंसी
जुन्गा (शिमला)। दुर्गाष्टमी पर क्योंथल क्षेत्र में धराड़ी पूजा की गई। पहाड़ी क्षेत्रों में असोज माह के नवरात्रों में अष्टमी पर धराड़ी पूजा का विशेष महत्व है। धराड़ी एक जंगली सफेद रंग का फूल है जिसकी अष्टमी के दिन दुर्गा के रूप में पूजा की जाती है।
वरिष्ठ नागरिक दया राम वर्मा और दौलत राम मेहता ने बताया कि धराड़ी का त्योहार नवरात्र के समापन और शरद ऋतु के आगमन का सूचक है। धराड़ी पूजन की परंपरा कालांतर से चली आ रही है। अष्टमी के दिन लोग जंगलों से धराड़ी के फूलों को चुनकर लाते हैं। इसके गुच्छ बनाकर घर में पूजा के स्थान पर फूलों की माला पहनाकर सजाई जाती है। इसमें दुर्गा मां के साथ भैरव की भी पूजा की जाती है जिसे स्थानीय भाषा में धराड़ा कहा जाता है। रात को घर के मुखिया धराड़ी को चुनरी से ओढ़कर उसके समक्ष धूप, दीप, नैवेद्य और घर पर बनाए गए व्यंजन का प्रसाद भेंट करके विधिवत पूजा करते हैं। इसके बाद ही घर के लोग रात का भोजन करते हैं। इस दिन घर पर पहाड़ी व्यंजन अस्कली और दाल चावल बनाए जाते हैं। राजगढ़ के कुछ गांवों में धराड़ी को रात के अंतिम प्रहर यानि सुबह 4:00 बजे स्थानीय मंदिर या पानी के चश्मे के पास छोड़ा जाता है जबकि धराड़ा को घर में रखा जाता है।