हिमाचल में सेब के तय समर्थन मूल्य से प्रदेश के सेब बागवान नाराज हैं। उनका कहना है कि सेब की प्रति किलो उत्पादन लागत बीस रुपये प्रति किलो आती है, जबकि सरकार ने अभी तक सात रुपये प्रति किलो समर्थन मूल्य निर्धारित किया है। एक तरफ विदेशी सेब की चुनौती है तो दूसरी ओर सरकार ने सेब का समर्थन मूल्य नाममात्र तय किया है।
शिमला जिले के कुमारसैन क्षेत्र के बागवान नरेश ठाकुर और गौरे के बागवान विनय कुमार ने कहा कि वर्तमान में सेब उत्पादन लागत बीस रुपये प्रति किलो आती है। सरकार ने समर्थन मूल्य सात रुपये प्रति किलो निर्धारित किया है। यह उत्पादन लागत से काफी कम है। सेब बगीचों के प्रबंधन से लेकर पैदावार तक का खर्च भी सेब के समर्थन से पूरी पूरा नहीं होता।
मंडी मध्यस्थता योजना (एमआईएस) के तहत ए ग्रेड का समर्थन मूल्य देने की व्यवस्था भी है। सरकार ने आज दिन तक मंडी मध्यस्थता योजना के तहत ए श्रेणी के सेब का समर्थन मूल्य तय नहीं किया है। बागवानों को अपना अच्छा सेब मजबूरी में खुले बाजार में बेचना पड़ता है और इसका दाम बिचौलिए तय करते हैं। बागवान कोल्ड स्टोरों की कमी के कारण सेब बेचने को मजबूर रहते हैं।
प्रदेश फल एवं सब्जी उत्पादन संघ के अध्यक्ष हरीश चौहान ने कहा बागवानों को दिया जा रहा सेब के समर्थन मूल्य से उत्पादन लागत भी पूरी नहीं होती। सेब का उत्पादन खर्चा 20 रुपये प्रति किलो आता है। समर्थन मूल्य उत्पादन खर्चे के हिसाब से तय होना चाहिए। ए ग्रेड का सेब का समर्थन मूल्य भी तय किया जाए। प्रदेश के बागवानों को अगर ए श्रेणी के सेब का समर्थन मूल्य भी दिया जाता है तो बागवानों के पास फल बेचने का विकल्प मौजूद रहेगा।