एक खबर रिपोर्टर के प्रारंभिक सूचना एकत्र करने से लेकर संपादन और प्रकाशन तक कई हाथों से होकर गुजरती है। अखबार सिर्फ खबर प्रकाशित नहीं करते बल्कि उसकी पूरी जिम्मेदारी भी लेते हैं।
गलत खबर प्रकाशित होने पर कानूनी सुरक्षा भी पाठक को उपलब्ध है। अखबारों में उठाए मुद्दों का प्रभाव होता है। सोशल मीडिया में चलने वाली खबरों में यह सब नहीं होता।
इसकी विश्वसनीयता कम होती है। उन्होंने उदाहरण देेते हुए कहा कि कुछ समय पहले सोशल मीडिया में अभिनेत्री सोनाली बेंद्रे और एमडीएच के महाशय की मौत की खबरें आ रही थीं।
उनको श्रद्धांजलि तक दे दी गई थी। इससे इस बात पर मुहर लग जाती है कि सोशल मीडिया में कितनी सचाई है। समाचारपत्रों में राष्ट्रीय, अंतरराष्ट्रीय घटनाक्रम, प्रादेशिक खबरें और स्थानीय खबरों के साथ ही मौजूदा हलचल और फिल्मी, खेल सहित हर तरह के समाचार उपलब्ध रहते हैं।
सोशल मीडिया में जो मर्जी वह डाल दिया जाता है, जो भले ही आपके काम का है या नहीं। प्रतिष्ठित अखबारों ने अपने डिजिटल संस्करण भी शुरू किए हैं। जिन समाचार पत्रों की विश्वसनीयता है उनके डिजीटल संस्करणों को अच्छा रिस्पांस मिल रहा है।
प्रो. शशिकांत शर्मा ने कहा कि अखबारें मात्र एक दिन में तैयार की जाती हैं। इसके लिए पत्रकारों को जल्दबाजी में कई समाचारों को एकत्र करके उन्हें जल्दबाजी में भी छापना पड़ता है।
उन्होंने कि इस तरह से एक दिन में जल्दबाजी में किया कार्य इतिहास बन जाता है। इसके लिए उन्होंने उदाहरण देते हुए कहा कि जिस प्रकार से रात को बस हादसा हो जाता है और रिपोर्टर तुरंत न्यूज छापने के लिए सूचना देता है कि हादसे में 40 की मौत हो गई है।
दूसरे दिन पता चलता है कि हादसे में मात्र 20 ही लोगों की मौत हुई है। इस प्रकार से समय के अभाव और खबर मिस न हो जाए, इसके लिए रिपोर्टर को जल्दबाजी में अधूरी सूचना छापनी पड़ती है, जो इतिहास बन जाती है।
डा. रजनीश पठानिया
मेेडिकल कॉलेज के डीन एवं प्रधानाचार्य डॉ. रजनीश पठानिया ने प्रिंट मीडिया पर विश्वास जताते हुए कहा कि इस समय दंगों की असली जड़ सोशल मीडिया में चल रही फेक न्यूज हैं।
उन्होंने कहा कि सभी छात्र-छात्राओं को विश्वसनीयता और तथ्य परकता के लिए हमेेशा समाचार पत्रों को पढ़ना चाहिए। उन्होंने कहा कि अगर वह चैनलों और सोशल मीडिया पर भी कोई न्यूज पढ़ लेते हैं, तो भी वह हमेशा समाचारपत्र पढ़ते हैं।
उन्होंने इलेक्ट्रॉनिक मीडिया से अधिक प्रिंट मीडिया पर विश्वास जताते हुए कहा कि अखबारों में अगर गलत छप जाए तो उसके लिए कोर्ट भी जा सकते हैं और समाचार पत्र पूरी तरह से इसके लिए जवाबदेह रहते हैं।
प्रश्न : सर क्या समाचार पत्रों पर राजनीतिक दबाव होता है- राहुल श्याम, मेडिकल स्टूडेंट
जवाब: प्रतिष्ठित और विश्वसनीय समाचारों पर राजनेता दबाव नहीं डाल पाते हैं, बल्कि उल्टा उन पर ऐसे समाचारों का अधिक दबाव रहता है। ऐसे समाचार पत्र आर्थिक नुकसान सहकर भी सचाई पर अडिग रहते हैं।
प्रश्न : सर समाचार पत्रों में अधिकतर क्राइम और राजनीति की खबरें अधिक रहती हैं, इनमें साइंस से संबंधित खबरें कम क्यों होती हैं? -शिवानी खंडेलवाल, मेडिकल स्टूडेंट
जवाब : समय-समय पर यदि साइंस और टेक्नोलॉजी में बड़ी हलचल होती है तो उन खबरों को प्रमुखता से प्रकाशित किया जाता है। बाकी विस्तृत जानकारियों के लिए सप्ताह में कुछ पन्ने निर्धारित किए जाते हैं। वहीं, विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में साइंस से संबंधित सामग्री उपलब्ध है।
प्रश्न: हमें कैसे पता चले कि न्यूज सही है -कशिश, स्कूली छात्रा
जवाब : हालांकि समाचार पत्रों में प्रकाशित होने वाली खबरों के लिए समाचार पत्र पूरी तरह से जवाबदेह रहता है और गलत खबरें छपने के बहुत कम चांस रहते हैं। फिर भी इस बात का पता कभी न कभी चल ही जाता है कि न्यूज सही थी या गलत
सवाल : 40 का न्यूज पेपर 4 रुपये में कैसे संभव है -नवनीत, मेडिकल स्टूडेंट
जवाब : कोई भी बिजनेस घाटे पर अधिक समय तक नहीं चलाया जा सकता। कोई भी समाचार पत्र अधिक समय तक नहीं टिक सकता अगर उसे विज्ञापन नहीं मिले। जनहित के लिए न्यूज पेपर 40 के स्थान पर 4 रुपये में दिए जाते हैं लेकिन इसकी भरपाई विज्ञापन से की जाती है।
सवाल : जैकपॉट धमाका और अन्य स्कीमों के लिए पैसा कहां से आता है -संकेत, मेडिकल स्टूडेंट
जवाब : इसके लिए अखबार प्रबंधन की ओर से अलग से बजट का प्रावधान किया जाता है। इन स्कीमों को चलाने का मकसद भी अधिक से अधिक लोगों को समाचार पत्रों से जोड़ना ही रहता है।