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खेतीबाड़ी: अब लाहौल में लहलहाएगी काठू की फसल, आईएचबीटी पालमपुर कर रहा शोध

Thu, 12 Sep 2024 11:22 AM IST
Krishan Singh दिनेश जस्पा, संवाद न्यूज एजेंसी, केलांग (लाहौल-स्पीति)

सार

हिमालयी जैव संसाधन प्रौद्योगिकी संस्थान (आईएचबीटी) पालमपुर के शोधार्थी लाहौल घाटी के मडग्रां गांव में इसके ऊपर शोध कर रहे हैं।
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अब लाहौल में लहलहाएगी काठू की फसल - फोटो : संवाद
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विस्तार
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हिमाचल के खेत फिर से काठू की फसल से लहलहाएंगे। हिमालयी जैव संसाधन प्रौद्योगिकी संस्थान (आईएचबीटी) पालमपुर के शोधार्थी लाहौल घाटी के मडग्रां गांव में इसके ऊपर शोध कर रहे हैं। काठू की फसल को तैयार करने के लिए मडग्रां में 300 किस्मों की ट्रायल पर बिजाई की गई है। शोधार्थियों की मानें तो इसमें सबसे उन्नत गुणवत्ता की फसल के बीज को अहमियत दी जाएगी।

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लाहौल के साथ चंबा में भी इस पर शोध किया जा रहा है। वैज्ञानिकों की मानें तो इसके सार्थक परिणाम आने पर हिमाचल में विलुप्त हो रही काठू की फसल की बड़े पैमाने पर खेती की जा सकेगी। लाहौल घाटी में बड़े पैमाने पर काठू की खेती होती थी। लोग इसे एक समय खाने के लिए इस्तेमाल करते थे।

नगदी फसलों में विभिन्न किस्मों की सब्जियों और आलू की खेती से काठू की खेती सिकुड़ गई। शोधकर्ताओं का कहना है कि काठू की सब्जी में प्रोटीन और कैल्शियम भरपूर मात्रा में पाया जाता है। मार्केट में इसके बिस्कुट, नूडल्स, आटा और कई अन्य उत्पाद भी हैं। लाहौल निवासी छेरिंग फुंचोग (83) ने बताया कि कई वर्ष पूर्व लाहौल का हर परिवार काठू की खेती करता था। आज यह खेती विलुप्त होने की कगार पर है। आईएचबीटी पालमपुर की वैज्ञानिक डाॅ. वंदना जायसपाल ने बताया कि वह पिछले तीन साल से लाहौल में काठू की फसल पर शोध कर रही हैं। 
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सीएसआईआर-आईएचबीटी पालमपुर के निदेशक डाॅ. सुदेश कुमार यादव ने बताया कि लाहौल में काठू फसल के 300 किस्म के बीज लगाए गए हैं। जिस बीज के सार्थक परिणाम सामने आएंगे, उसको तरजीह देकर काठू की फसल बड़े स्तर पर तैयार होगी। काठू एक अनाज है, जिसे स्थानीय भाषा में ब्राफो और फुलाई भी कहा जाता है। इसके आटे से रोटी और अन्य पकवान बनाए जाते हैं। इसका स्थानीय व्यंजन चिलड़ा काफी प्रसिद्ध है। विशेषज्ञों के अनुसार इसमें प्रचुर मात्रा में प्रोटीन पाया जाता है।
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