धराड़ी के सफेद फूल एकत्रित कर बनाए जाते हैं गुच्छे
संवाद न्यूज एजेंसी
जुन्गा (शिमला)। राजधानी से सटे जुन्गा के क्योंथल क्षेत्र में दुर्गाष्टमी यानी आठयो पर्व पारंपरिक रीति-रिवाजों और धार्मिक श्रद्धा के साथ मनाया गया। इस अवसर पर क्षेत्र के विभिन्न गांवों में धराड़ी पूजन की सदियों पुरानी परंपरा निभाई गई।
अष्टमी की रात जंगली सफेद फूल धराड़ी को मां दुर्गा का स्वरूप मानकर विधिवत पूजा-अर्चना की गई। यह अनूठी परंपरा क्योंथल क्षेत्र की समृद्ध लोक संस्कृति, धार्मिक आस्था और प्राचीन मान्यताओं का प्रतीक है। वरिष्ठ नागरिक दया राम वर्मा, दौलत राम मेहता और प्रीतम ठाकुर के अनुसार धराड़ी पर्व नवरात्र के समापन और शरद ऋतु के आगमन का संकेत माना जाता है। इस पर्व को लोग परिवार की सुख-समृद्धि, खुशहाली और मंगलकामना के साथ मनाते हैं। धराड़ी पूजन की यह परंपरा पीढ़ी-दर-पीढ़ी चली आ रही है और आज भी ग्रामीण क्षेत्रों में इसे पूरी श्रद्धा के साथ निभाया जाता है।
आठयो के दिन लोग जंगलों से धराड़ी के सफेद फूल एकत्रित कर उनके गुच्छे बनाते हैं। इसके बाद घर के पूजा स्थल पर फूलों को सजाकर उनकी माला तैयार की जाती है। पारंपरिक पूजा में मां दुर्गा के साथ भैरव का स्वरूप भी दर्शाया जाता है, जिसे स्थानीय बोली में धराड़ा कहा जाता है। रात को घर के मुखिया द्वारा धराड़ी को चुनरी ओढ़ाकर पूजा-अर्चना की जाती है। इस दौरान धूप-दीप जलाकर नैवेद्य और घर में तैयार किए पारंपरिक पकवान अर्पित किए जाते हैं। पूजा संपन्न होने के बाद परिवार के सदस्य रात्रि भोजन करते हैं। इस अवसर पर घरों में विशेष रूप से पहाड़ी व्यंजन अस्कली के साथ दाल-चावल बनाए जाते हैं।
क्योंथल के कुछ गांवों में धराड़ी फूल की रात को पूजा करने के बाद स्थानीय मंदिर में विदाई की जाती है जबकि कुछ क्षेत्रों में रात के अंतिम पहर यानी सुबह करीब चार बजे स्थानीय मंदिर अथवा पानी के चश्मे के पास छोड़ने की परंपरा है। धराड़ा को घर में ही रखा जाता है। स्थानीय मान्यताओं के अनुसार, सूतक-पातक जैसी विशेष अपरिहार्य परिस्थितियों को छोड़कर इस पर्व की परंपरा अनिवार्य रूप से निभाई जाती है। पर्व के दौरान लोग धराड़ी को अगले वर्ष फिर से उसी श्रद्धा और उल्लास के साथ आने का निमंत्रण भी देते हैं।