जंगी-थोपन-पोवारी जल विद्युत परियोजना में कानूनी पेच
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विवादों में रही हिमाचल प्रदेश के किन्नौर जिले की जंगी-थोपन-पोवारी जल विद्युत परियोजना अब कानूनी पेच में फंस गई है। विदेशी कंपनी ब्रेकल के बाद अदानी समूह भी इस परियोजना को नहीं बनाना चाहता है। अदानी कंपनी अब अपफ्रंट मनी वापस चाहती है। प्रदेश सरकार ने पहले तो हां कर दी लेकिन अब 280.06 करोड़ देने बच रही है। मामला हाईकोर्ट में विचाराधीन है। ऐसे में प्रदेश का एक महत्वपूर्ण बिजली परियोजना लटक गई है। जंगी-थोपन परियोजना का सरकार ने अक्तूबर 2005 में टेंडर आमंत्रित किया था। विदेशी कंपनी ब्रेकल ने सबसे अधिक बोली लगाई। 960 मेगावाट के महत्वपूर्ण हाइड्रो पावर प्रोजेक्ट को ब्रैकल को वर्ष 2007 में आवंटित किया गया था। कंपनी ने खुद को दिवालिया घोषित कर दिया था और अपफ्रंट मनी जमा नहीं करवाई। उसके बाद यह प्रोजेक्ट अदानी कंपनी को दिया गया। अदानी समूह ने अपफ्रंट प्रीमियम के तौर पर 280.06 करोड़ जमा किए।
अपफ्रंट मनी वह पैसा होता है जो कंपनी प्रति मेगावाट की तय दर से सरकार को देती है। वैसे तो यह पैसा वापस नहीं होता है, लेकिन सरकार चाहे तो इस पैसे को दे भी सकती है। इस परियोजना के टेंडर को रद्द कर दिया गया। ब्रैकल कंपनी ने हिमाचल सरकार से पत्राचार किया और अगस्त 2013 को अदानी समूह के पार्टनर के तौर पर 280.06 करोड़ को ब्याज सहित वापस करने के लिए आग्रह किया। अक्तूबर 2017 में कैबिनेट मीटिंग में वीरभद्र सिंह सरकार ने फैसला लिया था कि अदानी समूह को पावर प्रोजेक्ट की 280 करोड़ की अपफ्रंट मनी वापस की जाएगी, लेकिन 5 दिसंबर, 2017 को सरकार ने अदानी ग्रुप पर दिखाई गई 280 करोड़ की मेहरबानी वाला फैसला वापस ले लिया। मामला प्रदेश हाईकोर्ट में पहुंचा और फिर लंबा कानूनी विवाद शुरू हुआ।
हाईकोर्ट की एकल पीठ ने गत 12 अप्रैल को मामले का निपटारा करते हुए सरकार को आदेश दिए थे कि वह कैबिनेट के निर्णय के अनुसार दो महीने की अवधि में अपफ्रंट प्रीमियम के 280.06 करोड़ वापस करे। इस फैसले को सरकार ने अपील के माध्यम से खंडपीठ के समक्ष चुनौती दी है। खंडपीठ ने एकल पीठ के आदेशों पर रोक लगाने से फिलहाल इनकार कर दिया है। 7 दिसंबर, 2017 के पत्राचार को रद्द करते हुए एकल पीठ ने स्पष्ट किया था कि जब कैबिनेट ने 4 सितंबर, 2015 को प्रशासनिक विभाग की ओर से तैयार किए विस्तृत कैबिनेट नोट पर ध्यान देने के बाद स्वयं ही यह राशि वापस करने का निर्णय लिया था तो अपने फैसले की समीक्षा करने का निर्णय कानून सम्मत नहीं है। खंडपीठ ने सरकार की अपील पर सुनवाई 26 सितंबर निर्धारित की है।