फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
विज्ञापन

सीने में पांच गोलियां खाकर भी डटा रहा ये जवान

विज्ञापन
विज्ञापन
पठानकोट में वायु सेना के एयरबेस में आतंकियों से लोहा लेते हुए हिमाचल के दो जवान शहीद हो गए हैं। डिफेंस सिक्योरिटी कॉर्प्स (डीएससी) के ये दोनों ही जवान एयरबेस कैंप के एंट्री गेट पर तैनात थे। शनिवार को आतंकियों से लोहा लेते हुए कांगड़ा जिले की शाहपुर तहसील के छतड़ी के सिहवां गांव के संजीवन कुमार राणा (51) और चंबा के भटियात की बलाणा पंचायत के बासा गांव के जगदीश चंद शहीद हो गए।
विज्ञापन


आतंकी हमले में संजीवन राणा ने सीने में पांच गोलियां लगने के बाद भी दुश्मनों को डटकर सामना किया। बुरी तरह से घायल संजीवन राणा को सैन्य अस्पताल लाया गया, जहां उन्होंने दम तोड़ दिया। चंबा के जगदीश चंद के भी सीने में गोलियां लगीं। दोनों जवानों की शहादत की सूचना परिजनों को प्रशासन के माध्यम से रविवार को मिली।

संजीवन और उसके साथियों ने मारा एक आतंकी

दोनों जवानों के पार्थिव शरीर सोमवार को उनके गांव पहुंचेंगे, जहां उनका राजकीय सम्मान के साथ अंतिम संस्कार होगा। संजीवन कुमार राणा अपने पीछे दो बेटियां कोमल एवं शिवानी, बेटा शुभम और पत्नी पिंकी छोड़ गए हैं। संजीवन के माता-पिता का पहले ही देहांत हो चुका है। संजीवन सेना की डोगरा रेजीमेंट में सेवाएं देने के बाद पिछले आठ सालों से डीएससी में थे।

वे दो साल पहले ही जम्मू से पठानकोट स्थानांतरित हुए थे। संजीवन पांच बहनों का इकलौता भाई था। परिजनों को मिली जानकारी के अनुसार जिस एंट्री गेट पर संजीवन राणा खड़े थे, वहां तीन से चार जवान तैनात थे। हमला होते ही कुछ घायल हो गए और कुछ ने पोजीशन संभाल ली। इस दौरान दीवार पर चढ़ते समय इन जवानों ने एक आतंकी को मार गिराया।

पहले भी आतंकियों से ले चुके थे लोहा

सुनील धीमान, शाहपुर। दस साल पहले भी सेना में सेवाएं देते समय जम्मू-कश्मीर के पुंछ में भी संजीवन राणा का देश के दुश्मनों से सामना हो चुका है। उस दौरान भी उन्हें गोलियां लगी थीं, लेकिन तब वह मौत को मात दे आए थे। पठानकोट एयरबेस में जिस दिन आतंकी हमला हुआ, उस दिन भी वह घर छुट्टी पर जाने वाले थे।

डीएससी के सुरक्षा कर्मी संजीवन राणा वर्ष 2009 में आर्मी से रिटायर हुए थे। इसके छह माह बाद ही डिफेंस सिक्योरिटी कोर्प्स में हवलदार भर्ती हुए। उन्होंने दो जनवरी को छुट्टी के लिए आवेदन किया था। इसी दिन आतंकी हमले में वे शहीद हो गए।  संजीवन को गोलियां लगने की खबर सुनकर उनका परिवार पठानकोट पहुंचा, लेकिन सेना के अधिकारियों ने पत्नी को संजीवन को नहीं देखने दिया। उन्हें वापस घर भेज दिया।

सैन्य अधिकारियों ने रविवार सुबह संजीवन के परिजनों को उनकी शहादत की सूचना दी। संजीवन की शहादत के बाद उनके पैतृक गांव में मातम का माहौल है। शहीद संजीवन की पांच बहने हैं। वह परिवार में सबसे बड़े थे। उनके माता-पिता का स्वर्गवास हो चुका है। अब परिवार में वह ही सबसे बड़े थे। संजीवन जब सेना में थे तो वह पहलवानी भी करते थे। सेना की तरफ से कुश्ती प्रतियोगिताओं में भाग लेते थे।

उनके पिता भी आर्मी में पहलवानी करते थे। गांव के पूर्व उपप्रधान अजय राणा, ओंकार राणा, बिंदु राणा, ज्ञान चंद, कर्म सिंह, बलदेव सिंह, करतार राणा ने बताया कि संजीवन बहुत ही मिलनसार थे। उन्होंने दो जनवरी को घर पर छुट्टी पर आना था। एसडीम धर्मशाला श्रवण मांटा ने कहा कि शहीद संजीवन का पार्थिव शरीर सोमवार को उनके पैतृक गांव में पहुंचेगा।

पत्नी-बच्चों का रो-रोकर बुरा हाल- पठानकोट में हुए आतंकी हमले में शहीद संजीवन राणा की पत्नी और बच्चों का रो-रोकर बुरा हाल है। पत्नी पिंकी देवी सजीवन की शहादत की खबर सुनते ही बेसुध हो गईं। उनके बच्चों शुभम, कोमल और शिवानी का भी रोक-रोकर बुरा हाल है। 

शहीद होने की खबर सुनते ही बेहोश हो गई पत्नी

पठानकोट में आतंकवादी हमले में भटियात उपमंडल के वासा गांव का जगदीश पुत्र चतरो राम उम्र 50 वर्ष शहीद हो गया है। जगदीश डिफेंस सर्विस कॉर (डीएससी) में सेवारत था। उसकी ड्यूटी पठानकोट में बेस कैंप के मुख्य गेट पर थी। जगदीश के हमले में शहीद होने की खबर उसके गांव तक रविवार सुबह ग्यारह बजे पहुंची।

सेना मुख्यालय से आए फोन को जगदीश की पत्नी स्नेहलता ने सुना और वह बेहोश हो गई। इसके बाद दूसरे लोगों ने सैन्य अधिकारियों से बातचीत की। जगदीश के परिजन उसके शव को लाने के लिए पठानकोट जाना चाहते थे लेकिन सैन्य अधिकारियों ने उन्हें ऐसा करने से रोक दिया।

देर शाम तक जगदीश का शव उसके पैतृक गांव नहीं पहुंचा था। जगदीश इससे पूर्व सेना में हवलदार था और 24 वर्ष तक सेवाएं देने के बाद तीन साल पूर्व सेवानिवृत्त हुआ था। जगदीश की मौत की खबर से समूचे इलाके में शोक की लहर है। जगदीश के शहीद होने की पुष्टि डीएसपी डलहौजी संतोष शर्मा ने की है।
विज्ञापन

तीन दिन पहले ही छुट्टी से ड्यूटी पर लौटे थे जगदीश

कपिल डोगरा, चुवाड़ी (चंबा)। एक दिन की छुट्टी काटकर पठानकोट एयरबेस लौटे चंबा जिले के जगदीश को क्या पता था कि वह दोबारा तिरंगे में लिपटकर ही लौटेंगे। डिफेंस सर्विस कोर (डीएसआर) के सुरक्षा कर्मी जगदीश का पूरा परिवार शनिवार को टेलीविजन से नजरें नहीं हटा पाया। पठानकोट में हमले की सूचना परिवार को सुबह सात बजे टेलीविजन पर मिली थी।

परिजन लगातार मोबाइल पर फोन कर रहे थे, लेकिन घंटी बजती रही और फोन किसी ने नहीं उठाया। डीएसआर मुख्यालय से भी परिजनों को कोई सूचना नहीं मिली। शनिवार रात को घर के सभी सदस्य नहीं सोए। जगदीश मंगलवार को छुट्टी लेकर घर आए थे और बुधवार सुबह ड्यूटी के लिए पठानकोट निकल गए थे।

जगदीश की पत्नी ने बताया कि आखिरी बार शुक्रवार को उनकी जगदीश से बात हुई थी। इसमें उन्होंने सब कुछ ठीक होने की बात कही। जगदीश अपनी दूसरी बेटी की शादी की योजना बना रहे थे। जगदीश की तीन बेटियां और एक बेटा हैं। सबसे बड़ी बेटी ज्योति की शादी हो चुकी है। किरण केंद्रीय विश्वविद्यालय शाहपुर से स्नातकोत्तर की पढ़ाई कर रही हैं।

छोटी बेटी तमन्ना भी कॉलेज में पढ़ती हैं। सबसे छोटा बेटा रजत संगरूर में कार्यरत है। जगदीश की पत्नी स्नेहलता ने कहा कि उन्हें यकीन नहीं हो रहा है कि उसके पति दोबारा कभी नहीं आएंगे। जगदीश के दोनों बड़े भाई सेना के सेवानिवृत्त हैं। बुद्धि सिंह और ध्यान सिंह ने बताया कि वे शव लेने के लिए पठानकोट जाना चाहते थे, लेकिन सैन्य अधिकारियों ने सुरक्षा कारणों से उन्हें रोक दिया।
और पढ़ें...
विज्ञापन
Next
AU ऐप में पढ़ें