उनका कहना है कि उन्हें सरकार से पर्याप्त सुविधाएं नहीं मिली। उन्हें यूनिसेफ ने चुना था। लेकिन उनके सारे सपने चकनाचूर हो गए। उनका कहना है कि ओलंपिक के पथ प्रदर्शकों को हर दिन कुछ पारिश्रमिक मिलता है। लेकिन उन्हें कुछ नहीं मिला। पिछले 10 सालों से वे आर्थिक तंगी के दौर से गुजर रही हैं। उनका एक छोटा भाई और दो छोटी बहनें भी हैं जिनकी पढाई का खर्चा तथा पूरे घर का भार पिंकी के कन्धों पर है।
साल 2011 में ओलंपिक के बाद पिंकी ने बाल विवाह और शराब बंदी की दिशा में जागरूकता अभियान भी चलाया था, वे आज भी समाज सेवा के अभियानों से जुड़ी हैं। वे अब भी इस लड़ाई को जारी रखना चाहती हैं और आज भी नेशनल लेवल आर्चर बनकर परिवार और अपने देश का नाम रोशन करने का सपना देखती हैं।