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लोक जीवन की कथाएं रचने वाली गायनशैली 'बारहमासा'

Sat, 29 Feb 2020 10:01 AM IST
निलेश कुमार मीनाक्षी प्रसाद, शोधकर्ता व गायिका
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विरह में प्रेयसी (सांकेतिक तस्वीर) - फोटो : Social Media
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बारहमासा मूलतः एक विरहप्रधान लोक संगीत है। वर्ष भर के बारहमास में नायक - नायिका की श्रृंगारिक विरह और मिलन की क्रियाओं के चित्रण को बारहमासा कहते हैं। इसके पद्य या गीत में बारहों महीने की प्राकृतिक विशेषताओं का वर्णन किसी विरही या विरहनी के मुख से कराया जाता है। इस गीत में वह अपनी दशा को हर महीने की खासियत के साथ पिरोकर रखती है। इस शैली में ज्यादातर किसी स्त्री का पति परदेस कमाने चला जाता है और वह दुखी मन से अपनी सखी को बताती है कि पति के बिना हर मौसम व्यर्थ है।

सैंय्या मोरा गइले विदेसबा सखीरी ।

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जिया नाहीं लागे ।।
चार महीना गर्मी के लागल ।
नाहीं भेजे कौनो संदेसवा सखीरी ।।
-पारंपरिक बारहमासा

मलिक मोहम्मद जायसी द्वारा रचित महाकाव्य 'पदमावत' का एक प्रमुख हिस्सा 'जायसी का बारहमासा' है। ' जायसी ' हिन्दी साहित्य  के भक्ति धारा के कवि थे। ये उच्च कोटि के सूफी संत थे। 1467 ईसवीं -1552 ईसवीं तक इनका काल माना जाता है । चूंकि इनका जन्म उत्तर प्रदेश के अमेठी जिला के ' जायस ' ग्राम में हुआ था  इसीलिए यह जायसी कहलाते है। ये विशेषकर अवधी और फ़ारसी भाषा में लिखते थे। अखरावट , चित्ररेखा , मसला और पदमावत इनकी प्रमुख रचनाएं हैं।

'जायसी के बारहमासा' में रानी नागमती चित्तौड़ के राजा रतनसेन की विवाहिता पत्नी थीं। एक बार रतनसेन चित्तौड़ छोड़कर रानी पदमिनी (पदमावती) से ब्याह करने सिंघलद्वीप या श्रीलंका गए थे, लेकिन इस बारहमासा से ये प्रतीत होता है कि नागमती इस बात से अनभिज्ञ थीं। उन्हें राजा के श्रीलंका जाने का उद्देश्य मालूम ना था। नागमती अपने प्रियतम के वियोग में व्याकुल थीं। उन्हें ऐसा लगता है कि शायद राजा किसी अन्य स्त्री के प्रेम जाल में फंस गए हैं। पति के समीप रहने पर जो प्रकृति सुखदायी थी अब वही प्रकृति प्रियतम के दूर रहने से अति दुखदायी लगने लगी है। नागमती कहती हैं –

नागर काहु नारि बस परा।

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तेहे मोर पिउ मोंसो हरा।।

इसका तात्पर्य है कि ऐसा प्रतीत होता है कि राजा रतनसेन को किसी चतुर नारी ने वशीभूत कर अपने ह्रदय में बसा लिया है और उस स्त्री ने मुझे राजा के हृदय से बाहर निकाल डाला है। तब नागमती की सखियां उसे ढाढस बंधाते हुए कहती हैं –

पार महादेई ! हिय ना हारु ।
समुझि जिउ , चित चेतु संभारु ।।

सखियां कहती हैं कि पटरानी आप हिम्मत नहीं हारें। अपने आप को संभालें। आपके प्रियतम जरूर वापस आएंगे। जिस प्रकार भौंरा कमल के पास जाता है, लेकिन उसे जैसे ही मालती के फूल की याद आती है वह पुनः मालती के पुष्प के पास वापस आ जाता है, उसी प्रकार महाराज भी वापस आ जाएंगे। यहां जायसी के बारहमासा के महत्त्वपूर्ण अंश का वर्णन अति आवश्यक है। पाठक अच्छी प्रकार बारहमासा का स्वरुप जान पाएंगे-

चढा आसाढ़ , गगन घन गाजा ।
साजा विरह दूंद दल बाजा ।।
सावन बरस मेह अति पानी ।
भरनि परी, हौं विरह झुरानी ।।
भा भादो दूभर अति भारी ।
कैसे भरौं रैन अधियारी ।।
लाग कुंवार , नीर जग घटा ।
अबहुं आउ कंत, तन लटा ।।
कातिक सरद चंद उजियारी ।
जग सीतल , हो विरहै जारी ।।
अगहन दिवस घटा निसि वाढी ।
दूभर रैनी, जाइ किमि गाढी ।।
पूस जाड़ थर - थर तन काँपा ।
सुरुज जाई लंका दिसी चाँपा ।।
लागेउ माघ परै अब पाला ।
बिरहा काल भऐउ जड़ काला ।।
फागुन पवन झकोरा वहा ।
चौगुन सीउ जाइ नहीं सहा ।।
चैत वसंता होई धमारी ।
मोहि लेखे संसार उजारी ।।
भा बैसाख तपनि अति लागी ।
चोआ चीर चंदन भा आगी ।।
जेठ जरै जग , चलै लुबारा ।
उठहिं बवंडर परहिं अंगारा ।।
विरह गाजी हनुमंत होई जागा ।
लंकादाह करै तन लागा ।।

आषाढ़ मास में बादल गरजने लगते हैं और ये मास सावन के आने का समाचार देने लगता है। सावन में नायिका का ह्रदय अपने प्रिय से मिलने के लिए व्यग्र हो रहा है। यही दशा भादो में भी है। परन्तु कुंवार (आश्विन ) के महीने में नायिका थोड़ी आशावान हो रही है कि अब बारिश कम हो रही है चारों ओर जल का प्रकोप कम हो रहा है, रास्ते सूख कर आवागमन के लायक हो रहे हैं तो अब उसके प्रियतम जरूर आएंगे। अपने प्रियतम से कहती है कि उसका शरीर वियोग से बीमार हो गया है। आश्विन मास के पूर्णिमा को शरद पूर्णिमा भी कहते हैं । सावन मास की रिमझिम वर्षा की बाद शरद पूर्णिमा की चांदनी रास रचाने की लिए मशहूर है।

नागमती कहती है कि सारी दुनिया शीतल हो गई है परन्तु उसके अंदर विरह की अग्नि जारी है। अगहन के महीने में दिन छोटा हो जाता है और रात लंबी होने लगती है। यह दुख असहनीय होता जा रहा है। नायिका कौए और भौरें से आग्रह करती है कि वे राजा रतनसेन के पास जाकर ये संदेश दें कि उनकी पत्नी विरह की आग में जल रही है और उसके धुएं से हम दोनों काले हो गए हैं। यहां नागमती की निश्छलता शिखर पर दिखती है। पूस की रात में ठंड से शरीर थर - थर कांप रहा है। अपने प्रियतम के साथ ये मौसम उन्हें इतना ठंडा नहीं लगता था पर अब तो लगता है कि सूर्य भी उसके पति की साथ दक्षिणायन होकर लंका चला गया है। यह पंक्ति जायसी के भूगोल ज्ञान को भी दर्शाता है।

मीनाक्षी प्रसाद, शोधकर्ता व गायिका (बनारस घराना) - फोटो : Amar ujala
माघ के महीने में पाला पड़ने से सर्दी और बढ़ गई है । इस जाड़े में उसकी अवस्था मृत सी हो रही है। अब उसकी इस अवस्था का सिर्फ एक ही उपचार है -प्रिय से मिलन, जो ताप का काम करेगा। फाल्गुन मास की ठंडी से सर्दी चौगुनी हो गई है। सब होली खेल रहे हैं पर नायिका विरह में तड़प रही है। नायिका अपने पूर्ण समर्पण का भाव दिखाती हुई कहती है कि काश मेरा यह शरीर मेरे प्रिय के काम आ जाता तो उसका जीवन अर्थपूर्ण हो जाता।

चैत-बसंत के मौसम में नायिका कहती है कि चारों ओर आम के मंजर लगे हैं , सभी खुशियां मना रहे हैं पर मेरे प्रिय नहीं आए। मेरा तो मानो संसार ही उजड़ गया है। वैशाख के महीने में गर्मी की तपिश बढ़ रही है और नायिका कहती है कि मुझे मेरे प्रिय के दर्शन से ही शीतलता मिलेगी। अंत में जेठ के महीनें में तेज लू चल रही है चारों ओर भीषण गर्मी है, मानो अंगारे बरस रहे हैं। अब नायिका की व्यग्रता चरम सीमा पर है और कह उठती है कि काश! हनुमान एक बार फिर इन गर्म अंगारों को लेकर लंका जाते और श्रीलंका जहाँ मेरे प्रिय है उस नगरी को जला डालते।

'राम करे हनुमत फिर जाएं।
लंका दाह पुनः कर आएं।।

'जायसी’ से तकरीबन एक शताब्दी पूर्व 'मैथिल कवि कोकिल' विद्यापति ठाकुर ’ ने भी बारहमासा की रचना की थी। इनका जन्म बिहार राज्य के मधुबनी जिले के बियासी गांव में 1352 ईस्वी में हुआ था। ये मैथिली और संस्कृत भाषा में लिखते थे। 'पदावली’, कीर्तिलता, कीर्तिपताका आदि इनकी प्रमुख रचनाएं है। उन्होंने अपने बारहमासा में नायक-नायिका के विरह -मिलन श्रृंगार के अलावा वैद धनवंतरि जी द्वारा दिए सुझाव कि स्वस्थ शरीर के लिए किन-किन महीनों में क्या क्या नहीं खाना चाहिए पर भी बारहमासा लिखा है –

साओनर साग ने भादवक दही।
आसिनक ओस ने फागुन मही।।
अगहनक जीर ने पुषक धनी।
माघक  मीसरी ने फागुन चना।।
चैतक गुड़ ने वैसावह तेल।
जेठक चलव ने अषाढ़क बेल।।
कहे धनवंतरि अहि सबसे बचे।
त वैदराज काहे पुरिया रचे।।

उपरोक्त कविता में कवि कहते है कि सावन के महीने में साग और भादों में दही नहीं खाना चाहिए। आश्विन में ओस व कार्तिक में छाछ से बचना चाहिए। अगहन के महीने में  जीरा और पूस में धनिया नहीं खाना चाहिए। जहां चैत के महीने में गुड़, वैशाख में तेल से बचना चाहिए, वहीं जेठ में ज्यादा चलना नहीं चाहिए और आषाढ़ में बेल फल से बचना चाहिए। धनवंतरी वैद ये कहते है कि जो परहेज करेंगे वे कभी बीमार नहीं पड़ेंगे। विद्यापति के श्रृंगारिक बारहमासा के कुछ अंश इस प्रकार हैं–

मास अखाड़ उनत नव मेघ।
पिया बिसलेखे रहओ निरमेघ।।
जेठ मास उजर नवरंग।
केत  चहए खल कामिनि संग।।

आषाढ़ के महीने में आकाश में मेघ उमड़ रहा है। नायिका पिया के वियोग में बेसहारा हो गई है। इसी  प्रकार सभी महीनों में विरह का वर्णन करती जाती है। और अंत में कहती है कि जेठ के महीने में पसीने से उसका साज-श्रृंगार मलिन पड़ गया है। इस माह में तो पक्षी तक अपने जोड़े के साथ घोसले में रहना चाहते हैं पर वो अपने प्रियतम से दूर है। पर विद्यापति अपनी नायिका को यह सुझाव देते हैं कि तुम विरह के बारहों मास में व्यथित ना हो वरन् नारायण पर विश्वास करो वे तुम्हारे सारे काम ठीक कर देंगे।

‘जायसी’ और विद्यापति की ही भांति भोजपुरी भाषा के हस्ताक्षर कवि ‘भिखारी ठाकुरजी’ ने भी बारहमासा की रचना की है। भिखारी ठाकुर का जन्म 18 दिसंबर 1887 ईस्वीं में बिहार के कुतुबपुर दियारा, सारन जिला में हुआ था। विदेशिया, गंगा-स्नान , राधे-श्याम बेहार आदि उनकी प्रमुख रचनाएं हैं । उनके बारहमासा की कुछ पंक्तियां यहां वर्णित है –

आवेला आषाढ़ मास लागेला अधिक आस।
बरखा में पिया घर रहितन बटोहिया।।
जोहे  वानी बाट जब लगन पहुंची।
जेठवा तब आई मोरे खेतवा बटोहिया।।

भिखारी ठाकुर भी अपनी नायिका से कहते हैं कि तुम भी अपने प्रियतम की खोज करो तुम्हारे घर भी निश्चित रूप से ढोल-बाजे बजेंगे।
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music - फोटो : music
उपरोक्त सभी बारहमासा में कवियों ने आषाढ़ मास को आधार मानकर अपनी रचना की है। ऐसा प्रतीत होता है कि आषाढ़ मास सावन मास के आने का समाचार देता है। श्रावण मास जो दो प्रेमियों के लिए प्यार का मौसम के रूप में माना गया है। और इस माह में विरह की वेदना सर्वाधिक होती है। इसलिए आषाढ़ को आधार माना है।

बारहमासा की तरह ही षडऋतु भी एक गायन शैली है। इसमें छह ऋतुओं- बसंत, ग्रीष्म, वर्षा, शरद, हेमन्त और शिशिर का वर्णन होता है। एक ऋतु दोमास के बराबर होते हैं। ऋतु सौर और चन्द्र दो प्रकार के होते हैं। धार्मिक कार्य में चंद्र ऋतुएं ली जाती है। जैसा कि हम जानते हैं कि बारहमासा में विप्रलंभ या विरह श्रृंगार होता है उसी प्रकार षडऋतु में संयोग श्रृंगार होता है। एक-दूसरे के प्रेम में अनुरक्त नायक एवं नायिका के मिलन का अभाव विप्रलंभ श्रृंगार होता है। संयोग काल में नायक और नायिका की पारस्परिक रति को संयोग श्रृंगार कहा जाता है । इसमें संयोग का अर्थ सुख की प्राप्ति है। एक उदाहरण षडऋतु का-
प्रथम वसंत नवल ऋतु आई।
सुऋतु चैत वैसाख सुहाई।।
सावन - भादो अधिक सुहावा।
आई सरद ऋतु अधिक प्यारी।।
 कवि जायसी का झुकाव सूफी मत की ओर था वहीं विद्यापति शिव भक्त थे। इनकी रचनाओं में जीवात्मा और परमात्मा में पारमार्थिक भेद न माना जाने पर भी साधकों के व्यवहार में ईश्वर की भावना प्रियतम के रूप में की गई है। क्या संयोग क्या वियोग दोनों में कवि, प्रेम के उस आध्यात्मिक स्वरुप का आभास देने लगता है, जिसमें जगत के समस्त व्यापार पूर्णतः परमात्मा के आदेश से होते हुए प्रतीत होते हैं।
 
ऊपर हमने देखा कि जहां बारहमासा में यही प्रकृति मिलन में बाधक बन रही थी, वहीं षडऋतु में प्रकृति प्रिया ओर प्रियतम को मिलाने का जरिया बन जाती है। अतः मनोवैज्ञानिक दृष्टिकोण से यह कहा जा सकता है कि इंसान के जीवन में घटित होने वाली समस्त घटना उसके मनः स्थिति से निर्देशित या नियंत्रित होती है। पारम्परिक बारहमासा में बेनिया (पंखा), छंवाना, जियरा या जिया, सैंय्या, जाड़ा, गर्मी, बरखा, संदेशवा, विदेशवा, झुलनी(नथ), फगवा(होली) आदि शब्दों का बहुतायत से प्रयोग होता है।

चूंकि बारहमासा का आधार लोकजीवन है, अतः इसमें लोकसंस्कृति की झलक मिलती है। प्रकृति हमें ये भी सिखाती है कि अगर जीवन में ग्रीष्म ऋतु आया है तो वर्षा ऋतु भी आती है, सर्दी आई है तो बसंत भी आता है अर्थात जीवन में कभी दुख है तो खुशी भी आती है। दुख के क्षणों में हमें धैर्य रखना चाहिए। उपरोक्त  कवियों के अलावा नानक, मीराबाई, कबीरदास सबने बारहमासा पर कविताएं लिखी हैं ।

एक मशहूर पारंम्परिक बारहमासा है, जिसमें एक नव विवाहिता जिसका पति कारोबार के सिलसले में परदेस जाने वाला है उसे अपनी शादी में मिले नई झुलनी (नथ) से रिझाने व जाने से रोकने की कोशिश करती है । उक्त बारहमासा की कुछ पंक्तियां इस प्रकार हैं –
नई झुलनी की छईयां।
बलम दुपहरिया बिताय ला हो।।
चार महीना क गर्मी पड़त हैं।।
टप - टप चुएला पसीनमा बलम।।
जरा बेनिया डुलाय दा हो।।
यहां तक कि फिल्मों में भी इस तर्ज पर गाने बने हैं। जैसे–
हाय-हाय ये मजबूरी, ये मौसम और ये दूरी
मुझे पल-पल ये तरसाए, तेरी दो टकिये दी नौकरी में मेरा लाखों का सावन जाए....
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