2 नवंबर को हनुमान गढ़ी से आगे पुलिस व सेना तैनात थी। कार सेवकों को रोकने के लिए गोलियां बरसाईं। सभी में भगदड़ मच गई। मैं अकेला वहीं फंस गया। बाद में पुलिस ने मुझे छोड़ दिया। 7 नवंबर 1990 को वहां से वापस फरीदाबाद आ गया। साल 1991 की शुरुआत में रामलला के आशीर्वाद से सोनीपत के मुरथल स्थित छोटूराम इंजीनियरिंग कॉलेज में ड्राफ्ट्समैन की नौकरी मिल गई। तभी से सोनीपत में रहने लगा।
हरियाणा अनुसूचित जाति वित्त एवं विकास निगम के निदेशक रविंद्र दिलावर बताते हैं कि वर्ष 1990 में मैं 10वीं कक्षा में पढ़ता था। चाचा श्यामलाल पार्षद के साथ जत्थे में शामिल होकर अयोध्या गया था। ट्रेन को लखनऊ से पहले जंगल में रोक दिया था। सेना के जवान जय वीर बजरंगी व जय श्रीराम का जयघोष कर रहे थे। जो भी कार सेवक जोश में उनके साथ नारा लगाता, उसे ही काबू कर ट्रेन से नीचे उतार लिया जाता था। हम वहां से बचकर ट्रेन से लखनऊ पहुंचे।
हमारे पास दो रुपये का करारा नोट था, जिस पर ओम श्रीराम लिखा हुआ था। यही कोड वर्ड था। लखनऊ के चंद्रनगर के आर्य समाज मंदिर में ठहराया गया था। दिन में प्रदर्शन करते थे। रात को सभी फर्श पर ही सोते थे। हमारे साथ गए सभी को पुलिस ने गिरफ्तार कर लिया था। हम दो ही बचे थे। साथियों ने हमें वापस भेज दिया और कहा कि घर जाकर हमारी सूचना दे दें। कुछ दिन बाद सभी वापस लौट आए थे। गीता भवन चौक पर सभी का भव्य स्वागत किया गया था।