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Ram Mandir: दिन खेतों में छिपकर गुजारा तो रात के अंधेरे में पैदल तय किया अयोध्या का सफर, पढ़ें संघर्ष की कहानी

Mon, 08 Jan 2024 10:52 AM IST
नवीन दलाल विष्णु कुमार, सोनीपत (हरियाणा)

सार

सोनीपत के सेक्टर-15 निवासी सुभाष चंद गुप्ता ने बताया कि अयोध्या में आंदोलन की चिंगारी सुलग रही थी। 21 अक्तूबर 1990 को कार सेवकों का जत्था अयोध्या के लिए रवाना हुआ। अयोध्या से पहले मनकापुर में पुलिस ने ट्रेन को रुकवा लिया और कार सेवकों को गिरफ्तार कर स्कूल में कैद कर दिया।
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सुभाष चंद्र और रविंद्र तलवार - फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
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राम मंदिर मामले में वर्ष 1990 में हुए आंदोलन में 300 कार सेवकों का जत्था अयोध्या रवाना हुआ था। रामलला के दरबार में हाजिरी लगाने के लिए कार सेवकों को भारी मुश्किलों का सामना करना पड़ा था। गोलीबारी और लाठीचार्ज के बीच कार सेवकों ने दिन खेतों में छिपकर गुजारे तो रात के अंधेरे में पैदल रास्ता तय करते हुए अयोध्या पहुंचे थे कार सेवक। सोनीपत से कारसेवकों में भाग लेने वालों में विश्व हिंदू परिषद के रोहतक विभाग मंत्री सुभाष चंद गुप्ता और हरियाणा अनुसूचित जाति वित्त एवं विकास निगम के निदेशक रविंद्र दिलावर उस समय के अपने संघर्ष की कहानी बताई।

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सेक्टर-15 निवासी सुभाष चंद गुप्ता ने बताया कि अयोध्या में आंदोलन की चिंगारी सुलग रही थी। 21 अक्तूबर 1990 को कार सेवकों का जत्था अयोध्या के लिए रवाना हुआ। अयोध्या से पहले मनकापुर में पुलिस ने ट्रेन को रुकवा लिया और कार सेवकों को गिरफ्तार कर स्कूल में कैद कर दिया। काफी नौजवान बचकर निकल भागे और खेतों में छिप गए, उनमें वह भी शामिल थे। दिन में ईख के खेतों में छिपे रहते और रात को पैदल ही अपना सफर तय करते थे। सभी को कोड वर्ड दिए गए थे।

जिनकी सहायता से सहायता मिल जाती थी। गांवों में रहने वाले कार्यकर्ता खेत में ही खाना पहुंचा देते थे और अगला कोड देकर रवाना कर देते थे। 11 दिन पैदल ही रास्ता तय कर अयोध्या में सरयू नदी के पुल पर पहुंचे। जहां पुलिस की ओर से घेरकर लाठियां बरसाई गईं। कई लोगों ने बचने के लिए पुल से नदी में छलांग लगा दी थी। पुलिस ने वहां से वापस खदेड़ दिया। वह गोरखपुर पहुंचे और सरयू के भयानक जंगल से होते हुए रात में नदी को नाव के सहारे पर कर अयोध्या गए थे।

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1991 में रामलला के आशीर्वाद से मिली नौकरी

2 नवंबर को हनुमान गढ़ी से आगे पुलिस व सेना तैनात थी। कार सेवकों को रोकने के लिए गोलियां बरसाईं। सभी में भगदड़ मच गई। मैं अकेला वहीं फंस गया। बाद में पुलिस ने मुझे छोड़ दिया। 7 नवंबर 1990 को वहां से वापस फरीदाबाद आ गया। साल 1991 की शुरुआत में रामलला के आशीर्वाद से सोनीपत के मुरथल स्थित छोटूराम इंजीनियरिंग कॉलेज में ड्राफ्ट्समैन की नौकरी मिल गई। तभी से सोनीपत में रहने लगा।
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अयोध्या से लौटने पर हुआ था भव्य स्वागत

हरियाणा अनुसूचित जाति वित्त एवं विकास निगम के निदेशक रविंद्र दिलावर बताते हैं कि वर्ष 1990 में मैं 10वीं कक्षा में पढ़ता था। चाचा श्यामलाल पार्षद के साथ जत्थे में शामिल होकर अयोध्या गया था। ट्रेन को लखनऊ से पहले जंगल में रोक दिया था। सेना के जवान जय वीर बजरंगी व जय श्रीराम का जयघोष कर रहे थे। जो भी कार सेवक जोश में उनके साथ नारा लगाता, उसे ही काबू कर ट्रेन से नीचे उतार लिया जाता था। हम वहां से बचकर ट्रेन से लखनऊ पहुंचे।

हमारे पास दो रुपये का करारा नोट था, जिस पर ओम श्रीराम लिखा हुआ था। यही कोड वर्ड था। लखनऊ के चंद्रनगर के आर्य समाज मंदिर में ठहराया गया था। दिन में प्रदर्शन करते थे। रात को सभी फर्श पर ही सोते थे। हमारे साथ गए सभी को पुलिस ने गिरफ्तार कर लिया था। हम दो ही बचे थे। साथियों ने हमें वापस भेज दिया और कहा कि घर जाकर हमारी सूचना दे दें। कुछ दिन बाद सभी वापस लौट आए थे। गीता भवन चौक पर सभी का भव्य स्वागत किया गया था।
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