वाल्मीकि आश्रम
बिठूर चुंगी से जाने वाले रास्ते पर मात्र 100 मीटर की दूरी पर वाल्मीकि आश्रम स्थित है। मान्यता है कि जब भगवान राम ने सीता माता का त्याग किया तब लक्ष्मण माता सीता को परियर उन्नाव के जंगलों में छोड़ गए थे। जहां से महर्षि वाल्मीकि सीता को अपने आश्रम ले आये थे। इसी आश्रम में महर्षि वाल्मीकि ने रामायण की देवलिप भाषा में रचना की थी। इस आश्रम का जीर्णोद्धार 19वीं शताब्दी में बाजीराव पेशवा द्वितीय ने करवाया था। तब से यह आश्रम पूज्यनीय स्थल के रूप में मान्य है।
सीता पाताल कुंड
वाल्मीकि आश्रम के पास ही सीता पाताल कुंड है। कहा जाता है कि इसी कुंड में माता सीता हमेशा के लिए धरती में समा गई थीं। आज भी लोग इस कुंड में दान पुण्य के रूप सिक्के डालते है।
पीलू का वृक्ष जहां मां सीता करती थी पूजा
वाल्मीकि आश्रम के पास ही पीलू का अति प्राचीन वृक्ष है। मान्यता है कि आश्रम में निवास के दौरान माता सीता इसी पीलू के वृक्ष के नीचे बैठकर पूजा अर्चना किया करती थी। मान्यता है कि तब से लेकर आज तक इस पेड़ पर कभी पतझड़ नही आया है। इसकी पत्तियां हमेशा बरकरार रही हैं।
लव कुश जन्म स्थली
वाल्मीकि आश्रम से 20 कदम की दूरी पर ही लव और कुश की जन्मस्थली है जहां मान्यता है जहां माता सीता के दो पुत्र लव और कुश हुए थे।पास में ही उनकी शिक्षा दीक्षा हुई थी।
रामायण काल के बाण
ब्रह्मवर्त घाट पर बने श्री रामजानकी मंदिर में लवकुश के तीर और बाण रखे हुए हुए। लव और कुश के इस बाण का इस्तेमाल प्रभु राम की सेना से युद्ध के दौरान किये थे। ये बाण आज भी इसी मंदिर में आने श्रद्धालुओं के मन में भगवान राम के प्रति आस्था को बढ़ाते है।
जब हनुमान जी को पेड़ से बांध दिया था लव कुश ने
वाल्मीकि आश्रम के पास जहां पर फव्वारा बना हुआ है, उसी स्थान पर रामायण काल में लव और कुश ने एक पेड़ से हनुमान जी को रस्सी में लपेटकर बंधक बना लिया था। वर्तमान में इस स्थान पर लवकुश और हनुमानजी जी की प्रतिमाएं स्थापित हैं।
सीता रसोई जहां सीता बनाती थी भोजन
वाल्मीकि आश्रम में ही सीता रसोई है। मान्यता है कि इस आश्रम में निवास के दौरान माता सीता स्वयं भोजन तैयार करती थी। इस रसोई घर में कुछ प्रतीकात्मक बर्तन रखे गए हैं।