Ayodhya Ram Mandir: सरयू से जानिये अयोध्या की मुक्ति के संघर्ष की दास्तां। सियासी कलाबाजियों के बीच 30 अक्तूबर 1990 को कारसेवकों ने विवादित ढांचे की ओर कूच किया। इस दौरान सुरक्षा बलों से काफी संघर्ष हुआ। पुलिस ने उनपर लाठी-गोली चलाई। इसमें कई कारसेवक मारे भी गए। लेकिन, कारसेवकों ने विवादित ढांचे के गुंबद पर भगवा झंडा फहरा दिया।
मुगल चले गए। अंग्रेज भी विदा हो गए। पर, मेरी नियति में अभी शांति नहीं थी। शिलान्यास के बाद जिला प्रशासन के आग्रह पर श्रीराम जन्मभूमि न्यास ने निर्माण कार्य रोक दिया था। चुनाव का माहौल था।
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शाहबानो प्रकरण में सर्वोच्च न्यायालय के गुजारा भत्ता देने के फैसले को कुछ मुस्लिम नेताओं व मौलाना के दबाव में संसद से पलट देने वाले तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी राममंदिर शिलान्यास का श्रेय ले रहे थे। उधर, राजीव पर बोफोर्स तोप तथा पनडुब्बियों की खरीद में घोटाले का आरोप लगाकर कांग्रेस से अलग हुए वीपी सिंह सत्ता की राह तलाशने के लिए आंदोलन कर रहे थे।
शिलान्यास पर कांग्रेस के रुख से मुस्लिमों में दिख रही नाराजगी मुलायम सिंह का भी हौसला बढ़ा रही थी। भाजपा भी पालमपुर अधिवेशन में राममंदिर निर्माण आंदोलन के समर्थन की घोषणा के बाद वोटों की लामबंदी में जुटी थी।
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जामा मस्जिद के तत्कालीन शाही इमाम मौलाना सैयद अब्दुल्ला बुखारी और बाबरी मस्जिद एक्शन कमेटी के कई नेताओं के जनता दल के समर्थन में सक्रिय होने से मुलायम को शायद वोटों की राजनीति की नई राह दिख गई थी। संतों को नई सरकार से कुछ समाधान निकालने की उम्मीद थी।
बाबरी मस्जिद एक्शन कमेटी तथा भाजपा के नेता एक साथ जनता दल के साथ जो खड़े थे। पर, सरकार बनने के बाद मुख्यमंत्री मुलायम ने बाबरी मस्जिद एक्शन कमेटी के संयोजकों में शामिल आजम खां को भी मंत्रिमंडल में शामिल कर मुस्लिम वोटों की लामबंदी की जो चाल चली, उससे संघ परिवार के कान खड़े हो गए।
श्रीराम जन्मभूमि मुक्ति यज्ञ समिति को भी अपनी साख पर सवाल लगने का खतरा खड़ा दिखा। प्रयागराज में 27-28 जनवरी, 1990 को संतों की बैठक में 14 फरवरी से राममंदिर निर्माण की कारसेवा की घोषणा कर दी गई।
पीएम वीपी सिंह ने संतों को मनाकर समाधान के लिए चार महीने की मोहलत ले ली। पर, संघ परिवार ने धर्मजागरण यात्रा का फैसला किया। बाबरी मस्जिद एक्शन कमेटी ने जिलों-जिलों में मुस्लिम सम्मेलनों का फैसला किया।
इस बीच, मुलायम ने हर कीमत पर मस्जिद की रक्षा का एलान कर माहौल गरमा दिया। केंद्र सरकार के किसी समाधान पर न पहुंचने से क्षुब्ध विहिप व संतों ने 24 मई, 1990 को हरिद्वार में हिंदू सम्मेलन कर देवोत्थानी एकादशी 30 अक्तूबर से अयोध्या में कारसेवा का एलान कर दिया गया।
संघर्ष...गुंबद पर भगवा झंडा
पीएम वीपी सिंह ने भाजपा के साथ हिंदुओं की लामबंदी रोकने के लिए पिछड़ों को 27% आरक्षण की सिफारिश वाली मंडल आयोग की रिपोर्ट लागू करने का दांव चला। इससे तनाव बढ़ गया। संतों के आह्वान पर कारसेवा के लिए जनजागरण को एक सितंबर से रामज्योति यात्राएं निकालने की घोषणा हुई।
मुलायम ने संघ-भाजपा पर सांप्रदायिकता फैलाने का आरोप लगाते हुए उसी तारीख से सद्भावना रैलियों की घोषणा कर दी। इनमें वे मस्जिद की रक्षा का एलान करने लगे। घोषणा की 30 अक्तूबर को कारसेवा तो दूर, अयोध्या में परिंदे को भी पर नहीं मारने देंगे। अयोध्या की 14 व पांच कोसी परिक्रमा पर रोक लगा दी। कहीं घोषित, कहीं अघोषित कर्फ्यू लगा दिया गया। अयोध्या के रास्ते सील कर दिए गए।
भाजपा के तत्कालीन राष्ट्रीय अध्यक्ष लालकृष्ण आडवाणी ने 25 सितंबर, 1990 को सोमनाथ से अयोध्या के लिए रथयात्रा शुरू की। मुलायम ने कारसेवा रोकने की घोषणा के साथ बड़े पैमाने पर गिरफ्तारियां शुरू कर दीं। इस बीच, वीपी सिंह ने बिहार के सीएम लालू प्रसाद यादव के जरिये आडवाणी को समस्तीपुर में गिरफ्तार करा दिया। प्रतिबंध के बावजूद अयोध्या पहुंचे अशोक सिंहल और श्रीशचंद्र दीक्षित के नेतृत्व में कारसेवकों ने 30 अक्तूबर को विवादित ढांचे की ओर कूच किया।
सुरक्षा बलों से काफी संघर्ष हुआ। पुलिस ने लाठी-गोली चलाई। कई कारसेवक मारे गए। पर, कारसेवकों ने विवादित ढांचे के गुंबद पर भगवा झंडा फहरा दिया । दो दिन बाद 2 नवंबर को फिर कारसेवकों व सुरक्षा बलों में संघर्ष में कोलकाता के दो भाइयों रामकुमार कोठारी और शरद कोठारी सहित कई कारसेवकों की जान गई।