नासदासीन्नो सदासीत्तदानीं नासीद्रजो नो व्योमा परो यत् ।
किमावरीवः कुह कस्य शर्मन्नम्भः किमासीद्गहनं गभीरम् ॥
अर्थ: उस समय अर्थात् सृष्टि की उत्पत्ति से पहले प्रलय दशा में असत् अर्थात् अभावात्मक तत्त्व नहीं था। सत् भाव तत्त्व भी नहीं था, रजःस्वर्गलोक मृत्युलोक और पाताल लोक नहीं थे, अन्तरिक्ष नहीं था और उससे परे जो कुछ है वह भी नहीं था, वह आवरण करने वाला तत्त्व कहाँ था और किसके संरक्षण में था। उस समय गहन कठिनाई से प्रवेश करने योग्य गहरा क्या था, अर्थात् वे सब नहीं थे।
ऋग्वेद के दशम मंडल के नासदीय सूक्त के उपरोक्त मंत्र से इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने विश्व के सबसे वृहद् निर्णय (8800 पृष्ठ) का श्रीगणेश किया।
रामलला के भव्य मंदिर का शिलान्यास 5 अगस्त 2020 को श्रद्धा विश्वास के साथ सम्पन्न हुआ। इसके साथ ही 5 शताब्दियों के विवाद का शमन हो गया।
यह लेख मुख्यतः न्यायालयीय वाद का संक्षेप में निरूपण करता है। इस विवाद में अनेकानेक प्राणों की आहुति हुई, देश व जनमानस में असाधारण आक्रान्तता, विषमता व क्लिश्टाक्लिष्ट चेतनाओं का समय-समय पर आधान हुआ परंतु अंततोगत्वा पटाक्षेप न्यायिक प्रणाली से ही सम्भव हुआ।
अनुक्रमणिका
1.प्रारम्भ
2.इलाहाबाद उच्च न्यायालय का वृहत न्याय
3.सर्वोच्च न्याय
4. उपसंहार
प्रारम्भ:
22-23 दिसम्बर 1949 कि रात्रि को हिंदू पक्ष के अनुसार विवादित स्थल में रामलला प्रकट हुए और मुस्लिम पक्ष के अनुसार बाबा अभय रामदास व अन्य द्वारा गुप्त रीति से स्थापित किये गये। 29 दिसम्बर को तत्कालीन मजिस्ट्रेट द्वारा स्थल अटैच (कब्जा) किया गया। 16 जनवरी 1950 को गोपाल सिंह विशारद ने जन्मभूमि स्थल पर पूजा के अधिकार के लिए पहला वाद जहूर अहमद, ऊ.प्र. शासन व 12 अन्य के विरुद्ध दायर किया गया।
परंतु इस वाद में एक कमी थी। CPC सेक्शन 80 के अंतर्गत यदि शासन को पक्षकार बनाते हैं तो 2 मास का नोटिस अनिवार्य होता है, जो यहाँ नहीं था। इस कमी को देखते हुए महंत रामचंद्र दास ने दूसरा वाद दिसम्बर 1950 में ही दायर किया। तीसरा वाद निर्मोही अखाड़ा ने 5 दिसम्बर 1956 को दाखिल किया।
हिंदुओं द्वारा इतने वाद करने के बाद मुस्लिम पक्ष जगा और 1961 में इस प्रकरण के चौथे वाद के रूप में याचिका दायर किया। दशकों के सन्नाटे के उपरांत 1986 में उपरोक्त चारो वादो को एक साथ टैग( संलग्न) कर मुक़दमेबाजी प्रारम्भ हुई।
इसी बीच 1986 में स्थल का ताला खुल गया और अब लड़ाई के दो प्रभेद हो गये:
1. जो विधि में विश्वास करके न्यायपालिका में संघर्षरत रहे; और
2. वो दल और व्यक्ति जो आंदोलन के मार्ग पर चले।
1989 में विश्व हिंदू परिषद (VHP) से सम्बंधित स्वर्गीय देवकी नंदन अग्रवाल, जो सेवानिवृत्त न्यायाधीश थे उन्होंने देखा कि रामलला तो कहीं समस्त प्रकरण में हैं ही नहीं अतः उन्होंने रामलला विराजमान, जन्मभूमि व स्वयं को रामलला का मित्र घोषित कर पक्षकार बनाया और पाँचवा वाद दाखिल किया। उसी वर्ष ये पाँचो वाद एक साथ टैग कर इलाहाबाद उच्च न्यायालय में स्थानांतरित हो गए।
बीच में बड़ी घटनाएँ हुई। 1991 में पहली कारसेवा हुई । तत्कालीन मुख्यमंत्री ने घोषित किया कि परिंदा भी पर नहीं मार पाएगा, सो पुलिस ने आंदोलन कर्मियों पर गोली चला दिया। परिणाम यह हुआ कि सैंकड़ों कारसेवकों ने राम के लिए प्राणों की आहुति दे दी। अगले ही वर्ष 6 दिसम्बर 1992 को अपार संख्या में कारसेवकों ने विवादित ढाँचे को गिरा दिया। सनद रहे कि वहाँ विधिवत रामलला की पूजा-समर्चा हो रही थी और वस्तुतः ढाँचे के आकार के विपरीत वहाँ समस्त क्रियाकलाप मंदिर के अनुरूप ही था। प्रचारित हुआ कि मस्जिद तोड़ा दिया गया। देश का वातावरण विषाक्त हो गया, जगह-जगह दंगे होने लगे, जान-माल की भारी क्षति हुई व प्रदेश सरकार बर्खास्त हो गयी।
1993 में भारत सरकार ने कानून बनाकर विवादित जमीन का अधिग्रहण कर लिया। इस अधिग्रहण के विरुद्ध मुस्लिम पक्ष सर्वोच्च न्यायालय पहुँच गया। साथ ही केंद्र सरकार द्वारा राष्ट्रपतिके माध्यम से सर्वोच्च न्यायालय से विधिक विमर्शके (प्रेसीडेंसीयल रेफेरेंस) माध्यम से पूछा कि क्या वहाँ जन्मभूमि थी।
SC ने इस प्रश्न का उत्तर देने से मना कर दिया तथा तकनीकी बिंदुओ के आधार पर अधिग्रहण को अवैध घोषित कर दिया। SC ने मात्र 130 फीट x 90 फीट को ही विवादित माना और HC को इसके निस्तारण का निर्देश दिया।