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नया वोटर बिगाड़ेगा कांग्रेस का गणित

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राजस्थान की वोटर लिस्ट में मतदाताओं की संख्या में अच्छा-खासा इजाफा हुआ है, जिसे देश की सत्ताधारी पार्टी के लिए अशुभ संकेत माने जा रहे हैं।
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राजस्थान की वोटर लिस्ट में लोकसभा चुनाव से पहले करीब 59 लाख नए नाम जुड़ गए हैं। साथ ही, इस चुनाव में पहली बार वोट डालने वाले साढ़े 15 लाख युवाओं को वोटर लिस्ट में शामिल किया गया है।

राजस्थान में चुनावों का पिछला रिकॉर्ड देखा जाए, तो जब भी वोटरों की संख्या बढ़ी है, तब-तब सत्ता विरोधी लहर ने अपना काम किया है। इससे पहले 1989 के हुए लोकसभा चुनाव में प्रदेश में सबसे ज्यादा 57 लाख मतदाता बढ़े थे।
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पहले भी हो चुका है कांग्रेस का सूपड़ा साफ

विशेषज्ञों के अनुसार राजस्थान में मतदाताओं की संख्या में वृद्धि राजनीतिक दृष्टि से देश में सत्ता परिवर्तन का संकेत है। पहले लोकसभा चुनाव में राजस्थान में कुल 76 लाख 76 हजार मतदाता थे। इसके बाद मतदाताओं की वृद्धि में बड़ा बदलाव 1977 में आया।

इस चुनाव में प्रदेश में 20 लाख मतदाता बढ़े। उस समय देश में जनता पार्टी की लहर थी और लोगों ने आपातकाल के विरोध में वोट दिया था। इस चुनाव में कांग्रेस को 25 में से सिर्फ एक सीट मिली। इधर, 1989 के चुनाव में नेता वी.पी. सिंह की लहर थी। वे बोफोर्स तोप सौदे के मामले में कांग्रेस की सरकार छोड़कर चुनाव मैदान में उतरे थे।

कांग्रेस को प्रदेश में एक भी सीट नहीं मिली। भाजपा, जनता दल और माकपा ने मिल कर 25 सीटें जीतीं। इन दोनों चुनावों में युवाओं ने बढ़-चढ़कर भागीदारी निभाई थी और दोनों ही बार कई युवा चुनाव जीतकर लोकसभा में पहुंचे थे।
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भाजपा ने बढ़ाई उम्मीद

भारतीय जनता पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष अशोक परनामी का कहना है कि बीते विधानसभा चुनाव में कांग्रेस के वोट प्रतिशत में कोई कमी नहीं आई है। बल्कि भाजपा इसलिए जीती है, क्योंकि उसके वोट 9 प्रतिशत बढ़ गए। ये वही वोट हैं जो नए मतदाताओं को जोडऩे के कारण पार्टी को मिले हैं।

यही कारण है कि पार्टी ने 163 सीट जीत देशभर में रिकॉर्ड कायम किया। अब लोकसभा चुनाव में भी कुछ ऐसा ही करने जा रहे हैं।

वहीं, कांग्रेस नेताओं का कहना है कि जनता पिछले दस साल के विकास को देखते हुए कांग्रेस को वोट देगी। उनका कहना है कि कई बार अनुमान गलत भी साबित हो जाते हैं।
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