बच्चों के मुद्दे पर कैसे काम करती है पुलिस
भारत स्थित यूनीसेफ कार्यालय की मदद से शुरू की गई ‘चाइल्ड फ्रेंडली पुलिसिंग सिस्टम’ यानि बाल-अनुकूल पुलिस प्रणाली के तहत पुलिस कर्मियों को नियमित रूप से प्रशिक्षण दिया जाता है।
बच्चों से की जाती है चर्चा
फिर प्रशिक्षित पुलिसकर्मी चयनित सुरक्षा सखियों (सुरक्षा मित्रों) और ग्राम रक्षकों जैसे स्वयंसेवक समूहों के माध्यम से समुदायों के साथ सीधा संपर्क बनाए रखते हैं। जिनके साथ पुलिस नियमित बैठक करती है। इन बैठकों में बच्चों के मुद्दे उठाए जाते हैं। इस कार्यक्रम का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा ‘वात्सल्य वार्ता’ (बच्चों की चर्चा) है, जिसमें वरिष्ठ पुलिस अधिकारी, स्कूल या समुदाय में, बच्चों के साथ जीवन्त चर्चा आयोजित करते हैं।
पांच हजार लड़कियों को थानों का करवाया गया दौरा
यूनिसेफ के इस कदम से पुलिस और समुदाय के बीच की खाई को पाटने और उनके प्रति विश्वास पैदा करने में काफी मदद मिलती है। इस पहल को मजबूत करने के लिए, पांच हजार से अधिक लड़कियों को जिले के विभिन्न थानों के दौरे के लिए भी ले जाया गया है।
उदयपुर के पुलिस अधीक्षक सुधीर जोशी बताते हैं कि बच्चे खुलकर, पुलिस संबंधित मुद्दे उठाते हैं, जिनपर त्वरित कार्रवाई की जाती है। हम बच्चों की मदद करने की पूरी कोशिश करते हैं, भले ही वो क्षेत्र हमारे दायरे में न आता हो। सुधीर जोशी बताते हैं कि हाल ही में, जब हमारी ‘वात्सल्य वार्ता’ में बिजली की कमी से बच्चों की परीक्षा की तैयारी पर नकारात्मक प्रभाव पड़ने का मुद्दा सामने आया तो हमने बिजली आपूर्ति कार्यालय में जाकर इस समस्या को सुलझाने की कोशिश की।
बाल मजदूरी में भी आई कमी
उनके अनुसार बाल-अनुकूल पुलिस प्रणाली की एक बड़ी उपलब्धि यह रही है कि बाल मजदूरी के लिए, पड़ोसी राज्य जाकर काम करने वाले बच्चों की संख्या में भारी कमी आई है। खासतौर पर पुलिस ने बालश्रम के लिए पलायन रोकने के लिए विशेष चौकियां बनाई हैं।