पाकिस्तान की सीमा से पांच किलोमीटर पहले राजस्थान के बाडमेर के कैरकोरी गांव में रहनेवाले शरीफ को जितनी प्यास लगती है, वो उससे आधा पानी ही पीते हैं।
शरीफ कहते हैं कि पानी बचाना जरूरी है क्योंकि यहां पानी की कोई व्यवस्था नहीं है, यहां कपडे भी 20 दिन बाद धोए जाते हैं।
बारिश होती है तो गांव के कुंए में पानी भर जाता है बाकी समय घर की महिलाएं पांच किलोमीटर दूर पैदल चलकर जाती हैं और मटका भरकर पानी लाती हैं।
पानी ला दो
हाथ जोडकर मुझे कहते हैं, "कुछ भी करके पानी ला दो। हमें बस पानी चाहिए। इस बालू के बीच हमारा गला हमेशा सूखा रहता है और हमारे पशु मर जाते हैं।"
उनके हाथ नीचे कर मैं कहती हूं कि मैं सरकार नहीं पत्रकार हूं। इस पर वो कहते हैं, "सरकार तो पांच साल में एक बार ही हमारे पास आती है और उसे चुनने का हक जताने के लिए भी हमें ही पांच किलोमीटर पैदल चलकर जाना पडता है।"
'सडक नहीं'
गांव के आसपास सात किलोमीटर तक कोई सडक नहीं, सिर्फ बालू है। हमने ये रास्ता एक बडी गाडी में तय किया था। गांववाले रोज पैदल ही करते हैं।
गांव में बिजली के तार आए हैं लेकिन बिजली नहीं है। ठीक वैसे ही जैसे पानी की पाइप लाइन और टंकी तो है पर सालों से टूटी हुई है।
चुनावी मौसम
एक बुजुर्ग महिला मुझे पास बुलाकर कान में कहती हैं, "बेटा उम्र बीत गई पानी का घडा ढोते-ढोते लेकिन पानी यहां नहीं आया।"
जो यहां आई और रह गई, वो है उम्मीद। चुनाव से और चुनावी मौसम में एक बार दर्शन देने वाले नेताओं से।
हैरानी हुई ये जानकर कि मतदान के बारे में सबका मत एक है कि वोट तो जरूर डालना है। ये हक वो हताशा के आगे नहीं छोडना चाहते।
मतदाता पर्ची
हमारी मौजूदगी में ही वहां ब्लॉक लेवल अधिकारी आए और मतदान के लिए मतदाताओं को पर्चियां देने लगे।
अपनी पर्ची दिखाते हुए हुकुम सिंह बोले कि आखिरकार यहां स्कूल भी तो आ ही गया।
'धर्म की राजनीति'
जाते-जाते एक महिला से मैं पूछ बैठी कि कौन सी पार्टी पसंद है? वो बोलीं, "कांग्रेस, उसी को वोट दूंगी। हमारे विधायक कांग्रेस से हैं और मुसलमान हैं। हम भी मुसलमान हैं। बस इसलिए।"
मेरा मुंह खुला का खुला रह गया। सोचने लगी कि जिस गांव में ना पानी पहुंचा, ना बिजली, ना सडक का रास्ता, ना शिक्षा की बयार, वहां के लोगों को धर्म की राजनीति का पाठ किसने पढा दिया?
(इस खबर पर प्रतिक्रिया देने के लिए नीचे के बॉक्स में कमेट करें, शेयर करने के लिए फेसबुक शेयर बटन पर क्लिक करें)