कांग्रेस को जनता ने स्पष्ट बहुमत भले ही न दिया हो, लेकिन सरकार बनाने के लिए पक्का रास्ता तैयार कर दिया है। अब कांग्रेस में अंदरखाने बने हुए खेमों की राजनीति तेज हो गई है। पार्टी के वरिष्ठ नेताओं का खेमा राष्ट्रीय महासचिव व दो बार मुख्यमंत्री रह चुके 40 दशक से अधिक का राजनीतिक अनुभव वाले अशोक गहलोत के साथ है, तो दूसरी ओर युवा नेताओं का धड़ा राष्ट्रीय अध्यक्ष राहुल गांधी के खास और भरोसेमंद राजनीतिक विरासत वाले व दो बार सांसद रहे सचिन पायलट के साथ खड़ा है। पायलट पहली बार विधानसभा चुनाव लड़े और जीते हैं।
रुझान के समय मंगलवार को स्थित दोनों के घरों में अजीब बन गई। सचिन पायलट के समर्थक और अशोक गहलोत के समर्थक उनके बंगले पर पहुंचे। यहां दोनों के घरों में जमकर नारेबाजी हुई। पायलट के घर कार्यकर्ताओं का नारा था हमारा सीएम कैसा हो, सचिन पायलट जैसा हो और गहलोत के घर नारे लग रहे थे कि हमारा सीएम कैसा हो, अशोक गहलोत जैसा हो। हालांकि दोनों नेताओं ने कहा है कि कांग्रेस में चुनाव से पहले मुख्यमंत्री का चेहरा घोषित करने की परम्परा नहीं है। अब सरकार बनेगी और आलाकमान तय करेगा कि किसे मुख्यमंत्री की जिम्मेदारी देनी है।
अशोक गहलोत का प्रदर्शन
लोकसभा से पहले राजस्थान विधानसभा के चुनाव हुए थे और तत्कालीन मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने पूरे चुनाव की बागडोर थी। मोदी सुनामी का असर विधानसभा चुनाव पर पड़ा और दिसंबर 2013 में कांग्रेस ऐतिहासिक हार के साथ 21 सीटों पर सिमट गई थी। गहलोत अच्छी संख्या वाला विपक्ष भी खड़ा नहीं कर पाए। इसके बाद वर्ष 2014 में लोकसभा चुनाव हुए और कांग्रेस के पास अशोक गहलोत जैसे अनुभवी नेता होने के बावजूद राजस्थान से एक भी सीट नहीं मिली। मारवाड़ क्षेत्र से भी सभी कांग्रेस प्रत्याशी हार गए।
लेकिन वर्ष 2014 में केंद्र में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की पूर्ण बहुमत वाली सरकार बनने के बाद पंजाब विधानसभा चुनाव में कांग्रेस ने अशोक गहलोत पर भरोसा किया। पंजाब में उन्होंने अच्छा प्रदर्शन करते हुए कांग्रेस की सरकार बनाने में काफी अच्छा योगदान निभाया। इसके बाद गुजरात विधानसभा चुनाव के लिए गहलोत को भेजा गया। यहां उन्होंने अन्य नेताओं के साथ मिलकर भाजपा को जीतने में पसीने छुड़ा दिए। फिर, कर्नाटक में गहलोत को जिम्मा दिया गया। कांग्रेस के अन्य नेताओं के साथ मिलकर भाजपा की सरकार नहीं बनने देने में वे सफल हुए। यहां कांग्रेस के समर्थन से सरकार बनी।
सचिन पायलट का प्रदर्शन
विषम हालातों में राष्ट्रीय अध्यक्ष राहुल गांधी ने अपने खास और भरोसेमंद सचिन पायलट को 21 जनवरी 2014 को प्रदेश कांग्रेस की कमान सौंपी थी। कहा जा सकता है कि उन्होंने भरोसे को बनाए भी रखा। प्रदेश अध्यक्ष बनते ही पिछले लोकसभा चुनाव में मोदी सुनामी में वे अपनी अजमेर सीट गवां बैठे। उस दौरान राजस्थान की सभी 25 सीटें भाजपा के खाते में चली गईं। दोनों ही बड़े चुनावों में मिले परिणाम से कांग्रेस कार्यकर्ता हतोत्साहित थे और निराशा से घिरे हुए थे।
लेकिन इसके बाद पायलट ने एक के बाद एक हर उपचुनाव में राजे से विधानसभा ही नहीं लोकसभा सीटें भी छीनीं, जिससे कांग्रेस कार्यकर्ताओं में ऊर्जा का संचार हुआ। वर्ष 2014 में चार विधानसभा सीटों पर हुए उपचुनाव में सचिन पायलट ने कोटा साउथ सीट छोड़ कर बाकी सूरजगढ़, नसीराबाद और वैर भाजपा से छीन लीं। इसी वर्ष की शुरुआत में राजस्थान विधानसभा चुनाव के लिए सेमीफाइनल माने जा रहे अजमेर और अलवर लोकसभा सीटों तथा मांडलगढ़ विधानसभा सीट पर उपचुनाव में कांग्रेस ने भाजपा के दांत ही खट्टे कर दिए और तीनों सीटें बड़े मत के अंतर के साथ भाजपा से छीन ली।