लोकसभा चुनावों के लिए भाजपा ने राजस्थान की 25 में से 15 सीटों पर प्रत्याशी घोषित कर दिए हैं। 10 सीटों पर एलान बाकी है। आज हम बात कर रहे हैं राजस्थान की सबसे हॉट सीटों में से एक राजसमंद की। हालांकि इस पर अभी बीजेपी और कांग्रेस दोनों के प्रत्याशी घोषित नहीं हुए हैं, लेकिन यहां इसकी चर्चा इसलिए अहम है, क्योंकि भाजपा और कांग्रेस इस बार यहां नया चेहरा उतारेगी।
राजसमंद संसदीय सीट परिसीमन के बाद 2009 में अस्तित्व में आई। तब से अब तक यहां एक बार कांग्रेस और दो बार भाजपा के प्रत्याशी जीते हैं। हालांकि जाति में ये तीनों ही राजपूत हैं। कांग्रेस की तरफ से 2009 में गोपाल सिंह शेखावत ने भाजपा के स्टॉलवार्ट रासा सिंह रावत को हराया था। ये हार बेहद चौंकाने वाली थी, क्योंकि अपनी जाति के सबसे ज्यादा वोट होने के बाद भी रासासिंह रावत इस सीट से हर गए। वहीं, राजसमंद से सटी अजमेर लोकसभा सीट से वे लगातार पांच चुनाव जीत चुके थे।
दरअसल राजसमंद ही नहीं सेंट्रल राजस्थान में अजमेर डिविजन, पाली डिविजन और उदयपुर डिविजन और तीन जिले जिनमें नागौर, ब्यावर और राजसमंद शामिल हैं- ये राजस्थान की सबसे बड़ी मूल ओबीसी आबादी वाली बेल्ट है। यहां की कुल आबादी का 70 प्रतिशत लगभग मूल ओबीसी है। राजसमंद का ज्यादातर हिस्सा अजमेर लोकसभा में ही आता है।
रासा सिंह क्यूं हारे: रासासिंह के चुनाव हारने की वजह उनका सियासी रूप से कमजोर होना नहीं, न ही जातीय समीकरण उनके खिलाफ थे। उनके हारने की वजह आखातीज के दिन वोटिंग होना था। दरअसल सेंट्रल राजस्थान में आखातीज सबसे बड़ा सावा होता और खास तौर पर मूल ओबीसी वर्ग में शादी ब्याह के लिए यह साल का सबसे अहम दिन होता है। वोटिंग के दिन सावा होने की वजह से उनका वोटर बाहर चला गया। वहीं उनके साथ सियासी रूप से बेहद कमजोर कद वाले गोपाल सिंह शेखावत नागौर से राजसमंद आकर चुनाव जीत गए। इसके बाद शेखावत ने यहां कोई चुनाव नहीं जीता।
कांग्रेस इस बार रावत पर दांव लगाने की तैयारी में
कांग्रेस इस बार राजसमंद सीट पर अपना प्रत्याशी बदलने जा रही है। पिछली बार कांग्रेस के टिकट पर यहां से चुनाव लड़ चुके देवकीनंदन काका अब 81 साल की उम्र पार कर चुके हैं। सूत्रों के मुताबिक इस बार कांग्रेस यहां से रावत पर दांव लगाना चाहती है।
हालांकि कांग्रेस यदि रावत को यहां से प्रत्याशी बना देती है तो भाजपा के लिए यह मुकाबला बेहद चुनौती भरा होगा। पूर्व पत्रकार एवं राजनीति सलाहकार डॉ. अरविंद सिंह रावत का कहना है कि राजस्थान की अधिकांश ओबीसी जातियां भाजपा के सपोर्ट में रहती हैं, लेकिन चुनाव में उनका प्रतिनिधित्व यहां बड़ा मुद्दा है। राजसमंद वो सीट है, जहां ओबीसी सबसे बड़ी संख्या में हैं, लेकिन इसके बाद भी भाजपा ने यहां अब तक ओबीसी को टिकट नहीं दिया है।
भाजपा के बड़े नेताओं की नजर इस सीट पर
राजसमंद की सांसद रही दीया कुमारी अब राजस्थान सरकार में मंत्री बन चुकी हैं। इसलिए भाजपा अब इस सीट पर नया चेहरा उतारेगी। ऐसे में भाजपा के कई नेता इस सीट पर अपना सियासी भविष्य तलाश रहे हैं। इनमें राजेंद्र राठौड़ का नाम भी शामिल है।
राजसमंद सीट के जातीय समीकरण
यहां लोकसभा वोटर- 14, 89 231 हैं। यहां मुख्य रूप से जिन जातियों का सियासी प्रभाव है, उनमें सबसे आगे रावत राजपूत 3.5 लाख, एससी 3 लाख, जाट 2.5 लाख, कुमावत 1.5 लाख, राजपूत 1.5 लाख, वैश्य 1 लाख, ब्राह्मण 1 लाख, मुस्लिम 1.5 लाख और गुर्जर 50 हजार हैं। राजसमंद में 8 विधानसभा सीटे हैं। इनमें ब्यावर, मेड़ता, डेगाना, जैतारण, भीम, कुंभलगढ़, राजसमंद, नाथद्वारा सीट शामिल हैं। 2023 के विधानसभा चुनाव में इनमें से सभी सीट बीजेपी ने जीती।