झालावाड़ के पिपलोदा गांव में आज सुबह स्कूल की छत गिरने से आठ बच्चों की मौत हो गई और कई बच्चे अब भी गंभीर रूप से घायल हैं, जिनका उपचार चल रहा इस घटना के बाद राज्य सरकार भी हरकत में आ गई है। गौरतलब है कि प्रदेशभर में हजारों बच्चे रोजाना जान जोखिम में डालकर स्कूल जा रहे हैं। इनमें जैसलमेर जिले में हालात चिंताजनक है। जैसलमेर में 25 स्कूल बिना भवन संचालित हो रहे हैं, जहां बच्चों को झोपड़ी के नीचे पढ़ाई करवाई जा रही है। जबकि जिन स्कूलों के भवन है, उनमें 500 से ज्यादा सरकारी स्कूलों के 1200 कमरों को मरम्मत की जरूरत है। हर साल सूचनाएं भेजने के बावजूद भवनों की मरम्मत के लिए बजट स्वीकृत नहीं हो रहा है।
स्कूल की टपकती छत
स्कूलों में मरम्मत के नाम पर सरकार की ओर से मामूली बजट दिया जाता है, जिससे मरम्मत होना संभव ही नहीं है। ऐसे में सरकार व शिक्षा विभाग के उदासीन रवैये के कारण स्कूलों में पढ़ने वाले बच्चों की जान खतरे में हैं। औपचारिकता के तौर पर शिक्षा विभाग के अधिकारियों द्वारा स्कूलों का लगातार निरीक्षण किया जाता है लेकिन वास्तविक रूप से अधिकारियों द्वारा सिर्फ अपने टारगेट पूरे करने का कोरम पूरा किया जा रहा है। इससे भी ज्यादा खराब स्थिति वहां है जिन स्कूलों के भवन ही नहीं हैं। उनमें बच्चों को खुले आसमान के नीचे बैठकर ही पढ़ाई करनी पड़ रही है और जिन स्कूलों के भवन हैं वहां जर्जर कमरों के कारण या तो एक से ज्यादा कक्षाओं को एक साथ बिठाकर पढ़ाया जाता है या फिर बाहर बरामदे या पेड़ के नीचे बिठाकर पढ़ाई करवाना शिक्षकों की मजबूरी है।
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शिक्षा विभाग द्वारा माध्यमिक व उच्च माध्यमिक स्कूलों को हर साल मरम्मत के नाम पर दस हजार रुपए का बजट दिया जाता है, जो किसी भी स्कूल में मरम्मत के लिए पर्याप्त नहीं है। वास्तविक रूप से 10 हजार में स्कूलों में सिर्फ रंग-रोगन का ही काम हो पाता है। इसके अलावा स्कूल के लिए किसी अन्य प्रकार के बजट का कोई प्रावधान नहीं है। इस बजट में स्कूल प्रबंधन को बिजली का बिल भी भरना होता है। ऐसे में स्कूल की मरम्मत होना असंभव है।
टूटी दीवार के साए में कैसे सुरक्षित रहेंगे बच्चे
ऐसे में स्कूलों में कभी हादसा होने की आशंका बरकरार है। इसके बावजूद शिक्षा विभाग कोई भी कार्रवाई करने को लेकर गंभीर नहीं है। करीब छह साल पहले राउप्रावि चैनपुरा का भवन भी स्कूल समय में ही भरभराकर गिर गया था। इस पर अधिकारियों का कहना था कि जयपुर से बजट सेंक्शन होने पर ही काम हो पाता है। जिला शिक्षा अधिकारी (माध्यमिक) महेश कुमार बिस्सा ने बताया कि स्कूल प्रबंधन समिति पदेन पंचायत प्रारंभिक शिक्षा अधिकारी को प्रस्ताव बनाकर देती है इसके बाद ब्लॉक शिक्षा प्रसार पदाधिकारी से होते हुए प्रस्ताव सर्व शिक्षा अभियान के एडीपीसी के पास जाता है। फिर एडीपीसी इसका एस्टीमेट व प्रस्ताव बनाकर जयपुर भेजता है। इसके बाद वहां से स्वीकृति आने के बाद ही मरम्मत करवाई जा सकती है। बजट सेंक्शन होने की लंबी प्रक्रिया और ढिलाई के चलते स्कूलों की हालत और खस्ता होती चली जाती है और अंतिम परिणाम इस तरह के हादसे होते हैं।