पूर्व मंत्री विश्वेंद्र सिंह और प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष गोविंद सिंह डोटासरा के बीच शुरू हुआ विवाद ऊपर से भले ही दो नेताओं के बीच मतभेद और संगठन को लेकर असहमति का मामला नजर आता हो, लेकिन ऐसे टकराव अक्सर इससे कहीं बड़े सवाल की ओर इशारा करते हैं और राजस्थान की सियासत का इतिहास ऐसे उदाहरणों से भरा पड़ा है। कांग्रेस हो या भाजपा, जब-जब आला कमान अपेक्षाकृत कमजोर पड़ा या उसका नियंत्रण ढीला हुआ, प्रदेश के मजबूत राजनीतिक क्षत्रपों ने अपने प्रभाव के साथ आवाज बुलंद की है। राजस्थान की राजनीति ऐसे कई दौर देख चुकी है, जब संगठन, सरकार और प्रभावशाली नेताओं के बीच खींचतान खुलकर सामने आई और कई बार इसका असर पार्टी के भीतर के समीकरणों से लेकर चुनावी राजनीति तक दिखाई दिया।
- 2002-03: गिरिजा व्यास के दौर में सरकार-संगठन में तालमेल का सवाल
उपचुनावों में कांग्रेस के खराब प्रदर्शन के बाद मुख्यमंत्री अशोक गहलोत के नेतृत्व और प्रदेश कांग्रेस कमेटी की भूमिका को लेकर सवाल उठे। सरकार और संगठन के बीच बेहतर तालमेल के लिए हाईकमान को समन्वय समिति बनाकर हस्तक्षेप करना पड़ा। विवाद का केंद्र यह था कि चुनावी प्रदर्शन की जिम्मेदारी सरकार और संगठन में किसकी है।
- 2004: नारायण सिंह के दौर में निकाय चुनाव की हार
2004 के निकाय चुनाव में कांग्रेस के खराब प्रदर्शन के बाद सरकार और संगठन के बीच जिम्मेदारी को लेकर खींचतान हुई। इस दौरान प्रदेश में बीजेपी की वसुंधरा राजे बतौर मुख्यमंत्री सत्ता की कमान संभाल रही थीं। हालांकि प्रदेश अध्यक्ष नारायण सिंह के दौर में भी यह सवाल उठा कि सरकार में सत्ता का दुरुपयोग करके निकाय चुनावों को प्रभावित किया।
- 2008: सीपी जोशी-गहलोत- मुख्यमंत्री पद की दौड़
विधानसभा चुनाव में प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष सीपी जोशी मुख्यमंत्री पद के प्रमुख दावेदार माने जा रहे थे। नाथद्वारा से एक वोट से उनकी हार के बाद मुख्यमंत्री पद की तस्वीर बदल गई और अशोक गहलोत मुख्यमंत्री बने। यहां मुख्य विवाद चुनाव से ज्यादा नेतृत्व के अगले चेहरे को लेकर था।
- 2018-20: गहलोत-पायलट- मुख्यमंत्री पद और सत्ता में हिस्सेदारी
2018 के चुनाव में टिकट वितरण को लेकर दोनों खेमों में मतभेद सामने आए। सरकार बनने के बाद मुख्यमंत्री पद को लेकर गहलोत और पायलट आमने-सामने थे। समझौते में गहलोत मुख्यमंत्री और पायलट उपमुख्यमंत्री बने, लेकिन सत्ता और संगठन में प्रभाव को लेकर खींचतान जारी रही। जुलाई 2020 में पायलट समर्थक विधायकों के साथ अलग रुख पर चले गए। इसके बाद उन्हें उपमुख्यमंत्री और प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष पद से हटा दिया गया।
- 2022: गहलोत-पायलट विवाद फिर चरम पर- मुख्यमंत्री बदलने का सवाल
गहलोत के कांग्रेस अध्यक्ष पद का चुनाव लड़ने की संभावना के बीच राजस्थान में मुख्यमंत्री बदलने की चर्चा शुरू हुई। पायलट को मुख्यमंत्री बनाए जाने की अटकलों के बीच गहलोत समर्थक करीब 90 विधायकों ने अलग बैठक की और विधानसभा अध्यक्ष को इस्तीफे सौंपने की पेशकश की। इस घटनाक्रम ने साफ कर दिया कि विवाद केवल दो नेताओं के बीच नहीं, बल्कि मुख्यमंत्री पद पर नियंत्रण और हाईकमान के फैसले को स्वीकार करने के सवाल तक पहुंच चुका था।
भाजपा भी इससे अछूती नहीं रही
2012: वसुंधरा राजे बनाम गुलाबचंद कटारिया
गुलाबचंद कटारिया की प्रस्तावित मेवाड़ यात्रा को लेकर राजे खेमे से विवाद हुआ। राजे ने पार्टी छोड़ने की चेतावनी दी और उनके समर्थन में 40 से ज्यादा नेताओं-विधायकों ने इस्तीफे की पेशकश की। दबाव बढ़ने के बाद कटारिया ने यात्रा वापस ले ली।
2013: राजे के नेतृत्व को लेकर विरोध
विधानसभा चुनाव से पहले भाजपा में वसुंधरा राजे को मुख्यमंत्री पद का चेहरा बनाए जाने को लेकर पार्टी के भीतर मतभेद सामने आए। घनश्याम तिवाड़ी समेत कुछ वरिष्ठ नेता राजे के नेतृत्व को लेकर अलग राय रखते थे। चुनाव के बाद राजे मुख्यमंत्री बनीं और तिवाड़ी ने सरकार की नीतियों तथा नेतृत्व पर लगातार सवाल उठाए।
2014: जसवंत सिंह की बगावत
लोकसभा चुनाव में बाड़मेर से टिकट को लेकर जसवंत सिंह और पार्टी नेतृत्व के बीच विवाद खुलकर सामने आया। पार्टी ने उनके स्थान पर कांग्रेस से आए कर्नल सोनाराम को टिकट दिया। इसके बाद जसवंत सिंह ने निर्दलीय चुनाव लड़ा।
2003: देवी सिंह भाटी : भाजपा से अलग होकर सामाजिक न्याय मंच
वसुंधरा राजे के उभार से पहले ही भाजपा में असंतोष का बड़ा उदाहरण देवी सिंह भाटी के रूप में सामने आया। आरक्षण नीति को लेकर पार्टी नेतृत्व से टकराव के बाद सितंबर 2003 में उन्हें भाजपा से निष्कासित किया गया। इसके बाद उन्होंने राजस्थान सामाजिक न्याय मंच बनाया और 2003 का विधानसभा चुनाव भाजपा के खिलाफ लड़ा। बीकानेर से भाटी 67,197 वोट लेकर जीते, जबकि भाजपा उम्मीदवार तीसरे स्थान पर रहे।
2008: किरोड़ी लाल मीणा : भाजपा छोड़कर एनपीपी का रास्ता
वसुंधरा राजे से मतभेदों के बाद किरोड़ी लाल मीणा ने 2008 में भाजपा छोड़ दी। उनकी पत्नी गोलमा देवी निर्दलीय विधायक बनीं और बाद में गहलोत सरकार में मंत्री रहीं। 2009 में मीणा ने दौसा से निर्दलीय लोकसभा चुनाव जीतकर अपनी ताकत दिखाई। 2013 में वे पीए संगमा की नेशनल पीपुल्स पार्टी (NPP) में शामिल हुए। पार्टी ने करीब 150 सीटों पर चुनाव लड़ा और चार सीटें जीतीं। कई उम्मीदवार भाजपा-कांग्रेस के बागी थे।
2013: हनुमान बेनीवाल : भाजपा में बगावत से अपनी पार्टी तक
नागौर से भाजपा विधायक रहे हनुमान बेनीवाल ने वसुंधरा राजे और पार्टी नेतृत्व के खिलाफ लगातार आक्रामक रुख अपनाया। अनुशासनहीनता के आरोपों के बाद उन्हें निलंबित और फिर निष्कासित कर दिया गया। 2013 में उन्होंने निर्दलीय चुनाव जीता और बाद में राष्ट्रीय लोकतांत्रिक पार्टी (RLP) बनाई। 2018 में भाजपा से गठबंधन और 2019 में एनडीए के साथ लोकसभा चुनाव जीतने के बाद 2020 में कृषि कानूनों के मुद्दे पर एनडीए से अलग हो गए।
एक्सपर्ट क्या कहते हैं?
वरिष्ठ पत्रकार त्रिभुवन का कहना है- जब जब पार्टियों का हाईकमान कमजोर रहा है या सत्ता में नहीं रहा है। तो क्षेत्रीय क्षत्रप अपना मुंह उठाते हैं और अपना काम निकालते हैं। अभी विश्वेंद्र सिंह से ज्यादा धारदार लोग अभी बीजेपी में बैठे हैं लेकिन क्यूंकि बीजेपी का हाई कमान मजबूत है इसलिए उनमें कोई बोल नहीं पाता।
कांग्रेस में छोटे-छोटे लोग भी बड़े-बडृे दावे करते हैं। ये हाईकमान के कमजोर होने का फिनोमिना है। विश्वेंद्र सिंह को कहा जा रहा है कि उन्हें पार्टी से निकाल देंगे। अभी ज्यादा दिन नहीं ुहुए हैं कि जो लोग कांग्रेस कांग्रेस छोडृकर गए थे उन्हें पार्टी में वापस लेकर खुश हो रहे हैं। पार्टी की कोई स्पष्ट नीति नहीं है। चुनाव में निकालते हैं चुनाव के बाद शामिल कर लेते हैं। चुनाव करीब आएंगे तो दोनों का नुकसान होगा। यही बीजेपी में हुआ करता था जब हाईकमान कमजोर था। कभी घनश्याम तिवाड़ी, गुलाबचंद कटारिया, जसवंत सिंह व किरण माहेश्वरी समेत कई नेता थे जो कुछ न कुछ बोलते थे।
सीपी जोशी ने कहा कि मैं कॉलेबरेटर हूं- स्पष्ट नाराजगी जताई लेकिन यूपीए सत्ता में भी थी। लेकिन स्पष्ट नाराजगी नहीं जताई। ऐसे समय विवाद छिड़ा है जब पंचायत चुनाव होना है। ऐसे समय में पंचायत चुनाव होना है तो इससे तो नुकसान ही होना है-