पति की चिता और सोलह शृंगार कर सजी पत्नी रूप तैयार थी
मालसिंह की मौत के बाद परिजन उसके शव को देवराला गांव लेकर पहुंचे। इसके बाद लोगों में अफवाह फैलाई गई कि रूप कंवर अपने पति मालसिंह की चिता पर सती होना चाहती है। एक तरफ मालसिंह के अंतिम संस्कार की तैयारी चल रही थी और दूसरी ओर रूप के सति होने का महिमामंडन किया जा रहा था। कुछ देर बाद मालसिंह की चिता और सोलह शृंगार कर सजाई गई रूप कंवर दोनों की तैयार थे।
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गोद में सिर रखा और चिता पर चढ़ गई रूप
समाज की मान्यताओं और सती प्रथा की परंपरा का हवाला देते हुए रूप के हाथ में एक नारियल थमा दिया गया। हाथ में नारियल लेकर रूप ने करीब 15 मिनट तक चिता की परिक्रमा लगाई और फिर चिता पर चढ़ गई। रूप कंवर में पति का सिर अपनी गोद में रख लिया। लोगों ने चिता पर घी के कनस्तर पलटना शुरू किया और फिर आग लगा दी गई। कुछ ही सेकंड में रूप कंवर आग की लपतों में घिर गई और पति के साथ सती हो गई। इस घटना के बाद जहां रूप की चिता जलाई गई वहां उसके नाम का एक मंदिर भी बनाया गया। पुलिस ने इस मामले में रूप कंवर के ससुर सुमेर सिंह, देवर समेत पूरे गांव के लोगों को आरोपी बनाया था। हालांकि, इस बात पर विवाद है कि रूप कंवर खुद सती हुई थीं या उन्हें सती होने के लिए मजबूर किया गया था। घटना के बाद गांव के लोगों ने इसे एक धार्मिक और पवित्र कृत्य बताया, जबकि कई सामाजिक कार्यकर्ता और संगठनों ने इसे महिलाओं के अधिकारों के खिलाफ और अमानवीय घटना बताया था।
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सती प्रथा क्या है, रूप कंवर सती कांड का क्या असर हुआ?
सती प्रथा प्राचीन भारतीय परंपरा का एक हिस्सा थी, जिसमें विधवा महिला अपने पति की मृत्यु के बाद उसकी चिता पर आत्मदाह करती थी। इस प्रथा को समाज के कुछ हिस्सों में एक धार्मिक और सम्मानजनक माना जाता था। ब्रिटिश शासन के दौरान 1829 में लॉर्ड विलियम बेंटिक ने इस प्रथा पर कानूनन प्रतिबंधित कर दिया गया था, लेकिन इसके बाद भी देश के कई हिस्सों में यह गुप्त रूप से जारी रही। रूप कंवर की सती होने की घटना ने पूरे देश में भारी विरोध और आक्रोश पैदा किया। महिला अधिकार संगठन, समाज सुधारक और राजनीतिक दलों ने इस घटना की कड़ी निंदा की और इसे मानवाधिकारों का उल्लंघन बताया। घटना के बाद राजस्थान और केंद्र सरकार ने इसकी जांच के आदेश दिए। मामला अभी भी कोर्ट में चल रहा है।
भारत सरकार को बनाना पड़ा कानून
इस घटना के बाद 1987 में 'सती (रोकथाम) अधिनियम' को पारित किया गया। इस कानून का उद्देश्य सती प्रथा को रोकने और सती के महिमामंडन को दंडनीय अपराध घोषित करना था। इसके अंतर्गत, किसी भी महिला को सती बनने के लिए उकसाने, इसका महिमामंडन करने या सती स्थलों को धार्मिक महत्व देने वाले लोगों को सजा देना था।