25 साल पहले मालपुरा में दो समुदायों के बीच हुए दंगों में सभी 13 आरोपियों को बरी कर दिया है। कोर्ट ने पुलिस जांच पर सवाल उठाते हुए कहा कि केस की जांच तीन अलग-अलग अधिकारियों ने की थी लेकिन उचित जांच नहीं की गई।
जिले के मालपुरा में साल 2000 में दो समुदायों के बीच हुए सांप्रदायिक दंगे में कुल छह लोगों की मौत हुई थी। एक पक्ष से हरिराम और कैलाश माली की, जबकि दूसरे पक्ष से मोहम्मद सलीम, मोहम्मद अली और अन्य की मौत हुई थी। घटना के बाद दोनों पक्षों ने अलग-अलग मामले दर्ज कराए थे। इस केस में 22 लोगों को आरोपी बनाया गया था, जिनमें से सात आरोपी 2016 में ही हाईकोर्ट से बरी हो चुके थे। एक की मौत हो गई थी और एक का मामला जुवेनाइल बोर्ड में चल रहा है।
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मंगलवार को सांप्रदायिक दंगा मामलों की विशेष अदालत ने रामस्वरूप, छोटू बैरवा, किशनलाल गुर्जर, रत्नलाल, किस्तुरिया, कुबढ़िया उर्फ रामकिशोर, सत्या उर्फ सत्यनारायण, सुखपाल गुर्जर, पतराज उर्फ बछराज, किशन गुर्जर, देवनारायण उर्फ देवकरण, श्योजी गुर्जर और हीरालाल को संदेह का लाभ देते हुए बरी कर दिया। अदालत ने अपने फैसले में कहा कि इस केस की जांच तीन अलग-अलग अधिकारियों जगदीश सिंह (तत्कालीन सब इंस्पेक्टर), भूपसिंह तंवर (सीईआई CID CB) और पीसी भास्कर (सीईआई CID CB) ने की थी, लेकिन किसी ने भी उचित जांच नहीं की।
आरोपियों के वकीलों वीके बाली और सोनल दाधितच ने तर्क दिया कि सभी गवाहों के बयान विरोधाभासी हैं, घटना के समय आरोपियों के चेहरे ढंके हुए थे और हत्या में इस्तेमाल हथियार पुलिस बरामद नहीं कर पाई। इसके अलावा, धारा 144 लागू होने के बावजूद पुलिस द्वारा पेश किए गए गवाह घटनास्थल पर मौजूद नहीं थे और केवल एक आरोपी की ही शिनाख्त परेड करवाई गई। पीड़ित पक्ष के वकील पुरुषोत्तमन वाडा ने कहा कि अदालत के फैसले से न्याय की उम्मीदों को झटका लगा है, लेकिन कानूनी प्रक्रिया का सम्मान किया जाएगा।