राजस्थान के निकाय चुनाव में बारां नगर परिषद का नतीजा इसलिए सबसे ज्यादा चौंकाने वाला है, क्योंकि यहां मुकाबला भाजपा और कांग्रेस के बीच नहीं रहा। 60 वार्डों वाली नगर परिषद में आम आदमी पार्टी ने 31 सीटें जीतकर बहुमत हासिल कर लिया। कांग्रेस 18 सीटों पर सिमट गई, जबकि भाजपा को 9 वार्डों में जीत मिली। दो सीटें निर्दलीयों के खाते में गईं।
लेकिन बारां की कहानी को सिर्फ AAP की जीत कह देना इस पूरे उलटफेर को छोटा कर देता है। इस नतीजे के केंद्र में पार्टी से ज्यादा एक स्थानीय चेहरा रहा—पूर्व सभापति कमल राठौड़। चुनाव से ठीक पहले AAP में शामिल हुए राठौड़ ने ऐसा स्थानीय नेटवर्क खड़ा किया कि भाजपा और कांग्रेस के प्रभाव वाले शहर में तीसरा राजनीतिक विकल्प सीधे बोर्ड बनाने की स्थिति में पहुंच गया।
सिंबल AAP का, चुनाव कमल राठौड़ के नाम
चुनाव से पहले कमल राठौड़ सभी 60 वार्डों में निर्दलीय प्रत्याशी उतारने की तैयारी कर रहे थे। उनका लक्ष्य पूरे नगर परिषद क्षेत्र में अपना चुनावी नेटवर्क खड़ा करना था। सभी प्रत्याशियों के लिए सिंबल की व्यवस्था नहीं हो सकी तो उन्होंने चुनाव से कुछ समय पहले आम आदमी पार्टी का दामन थाम लिया।
AAP के सिंबल पर सभी 60 वार्डों में प्रत्याशी उतारे गए। प्रचार में पार्टी के बड़े नेताओं के चेहरों के बजाय स्थानीय प्रत्याशी और स्थानीय मुद्दे केंद्र में रहे। यहां तक कि दिल्ली के AAP नेतृत्व का प्रमुख चेहरा रहे अरविंद केजरीवाल की तस्वीर का भी प्रचार सामग्री में इस्तेमाल नहीं किया गया। यानी पार्टी का सिंबल जरूर AAP का था, लेकिन चुनावी नैरेटिव स्थानीय रखा गया। यही बात बारां के नतीजे को अलग बनाती है।
कमल राठौड़ की राजनीतिक जमीन पहले से तैयार थी
कमल राठौड़ बारां की स्थानीय राजनीति में नया नाम नहीं हैं। वे पहले कांग्रेस से जुड़े रहे और करीब ढाई साल तक नगर परिषद के सभापति भी रहे। सभापति रहते कराए गए विकास कार्यों को उन्होंने इस चुनाव में अपनी राजनीतिक पूंजी के तौर पर इस्तेमाल किया। उनकी रणनीति का दूसरा हिस्सा भाजपा और कांग्रेस दोनों के खिलाफ स्थानीय नाराजगी को मुद्दा बनाना था।
सड़क, पानी, बिजली और सफाई जैसी बुनियादी समस्याओं को लेकर लोगों की शिकायतों को उन्होंने लगातार चुनावी मुद्दा बनाया। उनका संदेश यह था कि शहर ने लंबे समय तक अलग-अलग समय में दोनों प्रमुख दलों को मौका दिया, लेकिन स्थानीय समस्याएं पूरी तरह खत्म नहीं हुईं। इसलिए इस बार बदलाव का विकल्प चुना जाए।
प्रमोद भाया से टकराव भी बना राजनीतिक पृष्ठभूमि
राठौड़ की राजनीति को समझने के लिए उनके पुराने राजनीतिक संबंधों को भी देखना जरूरी है। पिछली सरकार के दौरान फर्जी पट्टों से जुड़े मामले में कमल राठौड़ को जेल जाना पड़ा था। इसके बाद पूर्व मंत्री प्रमोद भाया के साथ उनका राजनीतिक विरोध और गहरा हुआ। बारां की राजनीति में भाया का अपना प्रभाव रहा है। उन्होंने इसी टकराव और स्थानीय असंतोष को अपने पक्ष में राजनीतिक स्पेस बनाने के लिए इस्तेमाल किया।
वसुंधरा राजे के प्रभाव वाले इलाके में तीसरे विकल्प की एंट्री
बारां-झालावाड़ क्षेत्र लंबे समय से वसुंधरा राजे की राजनीति का महत्वपूर्ण इलाका रहा है। दूसरी ओर कांग्रेस के लिए भी बारां की स्थानीय राजनीति में मजबूत चेहरे और संगठन रहे हैं। ऐसे राजनीतिक माहौल में जिस पार्टी का चुनाव से पहले यहां कोई बड़ा स्थानीय कैडर नजर नहीं आ रहा था, उसने 60 में से 31 वार्ड जीत लिए। यहां नतीजा इसलिए भी महत्वपूर्ण है कि AAP ने केवल कुछ सीटों पर प्रभाव नहीं दिखाया, बल्कि सीधे बहुमत का आंकड़ा पार कर दिया। इस लिहाज से बारां का चुनाव भाजपा बनाम कांग्रेस के पारंपरिक मुकाबले में तीसरी जगह बनने का उदाहरण बनकर सामने आया है।
राठौड़ खुद जीते, पत्नी भी जीतीं; अब सभापति की बारी
कमल राठौड़ खुद भी चुनाव जीत गए हैं और उनकी पत्नी ने भी जीत दर्ज की है। नगर परिषद सभापति का पद महिला के लिए आरक्षित है। ऐसे में बोर्ड गठन के अगले चरण में राठौड़ परिवार की भूमिका महत्वपूर्ण हो गई है। AAP के 31 पार्षदों के साथ बहुमत पहले ही उसके पक्ष में है। अब नजर इस बात पर है कि सभापति के पद पर पार्टी किसे आगे करती है। राठौड़ की पत्नी का नाम इस दौड़ में प्रमुखता से सामने आ रहा है।