दौसा जिले के डॉ. महेन्द्र मीना ने जोबनेर कृषि विवि में नई जैविक नैनो तकनीक का विकास किया है। भारत सरकार ने जोबनेर कृषि विवि की इस तकनीक को भारतीय पेटेंट जर्नल के फरवरी अंक में प्रकाशित किया है। डॉ. महेन्द्र ने इस सफलता का श्रेय अपने माता-पिता, डॉ. बलराज सिंह (कुलपति एसकेनएयू), डॉ. के के मीना, डॉ. योगेश कुमार शर्मा एवं पूरी शोध टीम को दिया है। डॉ. महेन्द्र को बहुत ही कम आयु में तीन पेटेन्ट मिल चुके हैं एवं इनका शोध पत्र विश्व प्रसिद्ध जर्नल नेचर में प्रकाशित हो चुका है।
2021 में हुए एग्री इंडिया हैकथान के विजेता बनकर एक लाख का पुरस्कार प्राप्त किया है। साथ ही इनकी पहली नैनो तकनीक को देश की सर्वश्रेष्ठ तकनीक से नवाजा गया था। वर्तमान में डॉ. महेन्द्र जोबनेर कृषि विवि के होर्टीकल्चर विभाग में वैज्ञानिक पद पर कार्यरत है और इस तकनीक को लैब स्तर से फील्ड स्तर पर पहुंचाने के लिए बड़े प्रोजेक्ट पर काम कर रहे हैं। अब तक डॉ. महेंद्र मीना ने पहले अमीनो अम्ल युक्त नैनो लिग्निन विकसित किया है।
क्या है नैनो तकनीक जाने
जोबनेर कृषि विश्वविद्यालय के कुलपति प्रोफेसर बलराज सिंह ने बताया कि यह नैनो फार्मूलेशन अमीनो अम्ल व लिग्निन से मिलकर बना हुआ है। इस नैनो फार्मूलेशन को बीज उपचार और छिड़काव के माध्यम से उपयोग में लिया जाता है। इसमें जैविक नाइट्रोजन की मात्रा अधिक होने के कारण पौधे की वृद्धि और विकास शीघ्र होता है एवं प्रकाश संश्लेषण अधिक होने से क्लोरोफिल की मात्रा बढ़ जाती है, जिससे फसलों के उत्पादन में बढ़ोतरी होती है। साथ ही नैनो फार्मूलेशन की रोग प्रतिरोधक क्षमता अधिक होने की वजह से पौधे में होने वाली बीमारियों से भी बचाव होता है। यह नैनो फार्मूलेशन पूर्णतया बायोडिग्रेडेबल है जो कि पूरी तरह सुरक्षित एवं पर्यावरण के लिए अनुकूल है।
किसानों के लिए सस्ती तकनीक व उपयोग में आसान
राजस्थान कृषि अनुसंधान केन्द्र, दुर्गापुरा के निर्देशक डॉ. अर्जुन सिंह बलोदा ने बताया कि इस जैविक नैनो तकनीक से एक हैक्टेयर भूमि में महज 150 ग्राम नैनो फार्मूलेशन का ही उपयोग करना पड़ता है। एक किलो नैनो फार्मूलेशन बनाने में केवल 1560 रुपये का खर्च आता है, जबकि अधिक मात्रा में बनेगा तो इससे भी कम खर्च आयेगा। कम लागत के साथ ही इस तकनीक के उपयोग से देश में रासायनिक पदार्थों का उपयोग कम होगा एवं मानव को अमीनो अम्ल युक्त फल-सब्जियां मिल पाएंगी। यह फार्मूलेशन उत्पादन में वृद्धि के अलावा फलों को जल्दी खराब होने से भी बचाता है। जैविक नाइट्रोजन की वजह से फल-सब्जियों की गुणवत्ता भी अच्छी मिलती है। भारत सरकार से पेटेंट मिलने के बाद अब इस तकनीक पर बडे़ पैमाने पर कार्य करने के लिए विवि को सरकार से बडे़ रिसर्च प्रोजेक्ट मिलने में भी मदद मिलेगी।
अमीनो अम्ल मानव स्वास्थ लिए जरूरी
जोबनेर कृषि विश्वविद्यालय के शिक्षा निदेशक डॉ. एन के गुप्ता ने बताया कि आहार संबधी आवश्यक अमीनो अम्ल मनुष्यों में संश्लेषित नहीं किये जा सकते। अमीनो अम्ल प्रोटीन संश्लेषण के लिए बहुत आवश्यक है। यह स्त्रियों में भ्रुण के स्वास्थ्य एवं विकास के लिए बहुत उपयोगी है। यह भ्रुण में एन्टीबॉडी डब्ल्यूबीसी और कोलाजन का निर्माण करता है। यह वयस्क मानव में मस्तिष्क व फेंफडों में आक्सीजन का प्रवाह, हीमोग्लोबिन की मात्रा का नियमन एवं शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता को बढ़ाता है।
रसायनों के उपयोग से राहत भी मिलेगी
भारत में प्रतिवर्ष हजारो टन रसायनों का उपयोग अधिक उत्पादन पाने के लिए किया जा रहा है। इस कारण पर्यावरण व स्वास्थ्य संबंधित समस्याएं उत्पन्न हो रही है। साथ ही मृदा की उर्वरक क्षमता कम होती जा रही है जिससे भविष्य में फसल उत्पादन पर बहुत घातक प्रभाव पडेगा। इस नई जैविक नैनो तकनीक से पौधों को जैविक नाइट्रोजन मिल पाएगी, जिससे फसलों की वृद्धि व उत्पादन बढ़ेगा।