गुरु हरगोबिंद साहिब मुगलों के साथ करतारपुर की लड़ाई के बाद जब कीरतपुर जा रहे थे, तब फगवाड़ा के पास पलाही गांव में मुगलों की फौज की एक टुकड़ी ने हमला कर दिया। युद्ध में पिता गुरु हरगोबिंद साहिब के साथ उन्होंने तेग (किरपाण) का ऐसा कमाल दिखाया कि उनका नाम ही त्याग मल से तेग बहादुर हो गया। यही गुरु तेग बहादुर कश्मीरी पंडितों के लिए बलिदान देकर हिंद की चादर बन गए।
सिख इतिहास के मुताबिक, भाई दयाला, भाई मति दास और भाई सती दास को पहले गुरु जी के साथ काबू करके उन्हें प्रताड़ित किया गया। गुरु तेग बहादुर साहब की आंखों के सामने भाई मती दास जी को आरी से दो भागों में काटा गया, फिर भाई दयाला जी को कड़ाही के उबलते पानी में डालकर उबाला गया। भाई सती दास जी को रुई में लपेट कर आग लगा दी। सैयद जलालुद्दीन जल्लाद ने अपनी तलवार खींची और गुरु जी का सिर तलवार से अलग कर दिया, उनका सिर काटकर जहां डाला गया, वहां शीशगंज गुरुद्वारा साहिब है।
इतिहास साक्षी है कि सिखों के आठवें गुरु, गुरु हरकृष्ण साहिब जी का स्वर्गवास हुआ तो उसके बाद मार्च 1665 को गुरु तेग बहादुर साहिब अमृतसर के नजदीक कस्बा बकाला में गुरु की गद्दी पर बैठे और सिखों के 9वें गुरु बने। औरंगजेब के शासनकाल में जबरन धर्म परिवर्तन का अभियान तेजी से चला और अत्याचार बढ़ गया था। कश्मीर के मटन निवासी पंडित कृपा राम के नेतृत्व में संकटग्रस्त कश्मीरी पंडितों का एक प्रतिनिधिमंडल श्री आनंदपुर साहिब में श्री गुरु तेग बहादुर साहिब की शरण में पहुंचा।
पंडितों ने गुरु तेग बहादुर साहिब को औरंगजेब की हुकूमत द्वारा जबरन धर्म परिवर्तन और अपनी तकलीफों की कहानी सुनाई। तब गुरु तेग बहादुर ने उत्तर दिया था कि एक महापुरुष के बलिदान से हुकूमत के अत्याचार खत्म हो जाएंगे। उनके पुत्र बालक गोबिंद राय (जो गुरु पद प्राप्त कर खालसा पंथ की स्थापना के बाद गुरु गोबिंद सिंह बने) ने सहज ही अपने पिता के आगे हाथ जोड़ कर अनुरोध किया कि पिता जी आपसे अधिक सत पुरुष और महात्मा कौन हो सकता है? श्री तेग बहादुर जी भी यही सोच रहे थे। उनके बेटे के विचारों ने उन्हें कुर्बानी के लिए प्रेरित किया। कश्मीरी पंडितों ने गुरु गोबिंद सिंह से कहा कि पिता बलिदान दे देंगे तो आप अनाथ हो जाएंगे। उन्होंने जवाब दिया कि अगर मेरे अकेले के यतीम होने से लाखों लोग यतीम होने से बच सकते हैं और अकेले मेरी मां के विधवा होने से लाखों मां विधवा होने से बच सकती हैं, तो मुझे यह स्वीकार है।