राष्ट्रीय जल सुरक्षा को मजबूती देने और क्षेत्रीय जल संकट से निपटने के लिए केंद्र सरकार ने एक महत्वाकांक्षी अंतर-बेसिन जल हस्तांतरण परियोजना का प्रस्ताव रखा है।
नहर बनने से पंजाब, हरियाणा और राजस्थान के सूखाग्रस्त क्षेत्रों में सिंचाई को स्थायी स्रोत मिलेगा। इससे कृषि मानसून पर निर्भर नहीं रहेगी और खाद्य सुरक्षा मजबूत होगी। राजस्थान के रेगिस्तानी जिलों में पेयजल संकट कम होने की उम्मीद है। सतही जल की उपलब्धता बढ़ने से भूजल दोहन घटेगा, जिससे गिरते जलस्तर पर अंकुश लगेगा। विशेषज्ञों के अनुसार, पंजाब में धान जैसी अधिक पानी वाली फसलों से भूजल पर बढ़ते दबाव को कम करने में यह परियोजना सहायक हो सकती है। सतही जल मिलने से फसल विविधीकरण को बढ़ावा मिलेगा और पर्यावरणीय संतुलन मजबूत होगा।
113 किलोमीटर लंबी यह नहर मौजूदा बांधों, सुरंगों और नहर नेटवर्क से जुड़ी होगी। परियोजना अभी व्यवहार्यता अध्ययन और डीपीआर चरण में है। केंद्र का अनुमान है कि सभी मंजूरियां समय पर मिलने पर निर्माण में करीब तीन वर्ष लगेंगे और दशक के अंत तक काम पूरा हो सकता है। बजट का औपचारिक खुलासा नहीं हुआ है लेकिन लागत कई हजार करोड़ रुपये आंकी जा रही है।
बीबीएमबी के रिटायर्ड एक्सईएन और नहरी परियोजनाओं के विशेषज्ञ तरजिंदर सिंह ढिल्लों ने इस योजना पर गंभीर सवाल उठाए हैं। उनका कहना है कि पहाड़ी इलाकों में टनल और नहर निर्माण अत्यंत जटिल, महंगा और जोखिम भरा है। ढिल्लों के अनुसार, जिस परियोजना को तीन साल में पूरा करने का दावा किया जा रहा है, उसमें हकीकत में 30 साल या उससे अधिक समय लग सकता है। उन्होंने यह भी चेताया कि चिनाब के जल को रावी–ब्यास–सतलुज से जोड़ना पाकिस्तान के साथ टकराव की स्थिति पैदा कर सकता है, जिससे अंतरराष्ट्रीय स्तर पर गंभीर परिणाम हो सकते हैं।
ढिल्लों ने कहा कि पंजाब से अन्य राज्यों को पानी भेजने की किसी भी नई योजना को राज्य की सिविल सोसाइटी स्वीकार नहीं करेगी। इससे सामाजिक और राजनीतिक तनाव बढ़ सकता है। उनके अनुसार यह परियोजना पंजाब के लिए लॉलीपॉप साबित हो सकती है और राज्य के जल संसाधनों पर दीर्घकालिक खतरा बन सकती है। कुल मिलाकर, जहां केंद्र सरकार इस नहर को जल संकट का स्थायी समाधान बता रही है। वहीं विशेषज्ञों की चेतावनियों ने इस महत्वाकांक्षी परियोजना पर नई बहस छेड़ दी है।