दोषी एसएचओ जिंदा होता तो ज्यादा संतुष्टि होती: भाई
मृतक साहिब के पिता ने इस मामले में दोषी पुलिस अधिकारियों को सजा दिलाने के लिए लंबा संघर्ष किया। उनकी मौत के बाद से मृतक के भाई सरताज केस लड़ रहे थे। उन्होंने कहा- मुख्य आरोपी एसएचओ आज जिंदा होता तो उसे सजा मिलती तो ज्यादा संतुष्टि मिलती।
मृतक के पिता के प्रयास से दर्ज हुआ था केस
मामले में साहिब सिंह के पिता काहन सिंह ने पंजाब एंड हरियाणा हाईकोर्ट की शरण ली। अदालत के आदेश पर सीबीआई ने 28 फरवरी 1997 में थाना मेहता के एसएचओ इंसपेक्टर राजिंदर सिंह, अतिरिक्त एसएचओ किशन सिंह व एसआई तरसेम सिंह पर हत्या समेत कई धारओं के तहत केस दर्ज किया।
1999 में आरोपियों के खिलाफ चार्जशीट फाइल कर दी। इसके बाद 2005 तक केस से जुड़े सारे साक्ष्य व दस्तावेज अदालत में पेश कर दिए। हालांकि बाद में मामले के आरोपियों ने अदालतों की शरण ले ली। इसके बाद उच्च अदालत ने 2006 में स्टे लगा दी थी जिसके बाद यह मामला लटका रहा।
पिता ने कहा था- हमें तो अखबार से पता चला कि बेटा मारा गया
सीबीआई के सामने साहिब सिंह के पिता काहन सिंह ने बयान दर्ज कराया था कि 1989 में उनके पिता की हत्या हो गई थी। इसके बाद उनका बेटा घर से चला गया था। वह दिल्ली में ट्रक ड्राइवरी करने लगा था। उन्हें पता कि नहीं चला था कि साहिब सिंह कब मध्य प्रदेश चला गया। उन्हें अखबार से पता चला था कि उनके बेटे समेत कुछ लोगों को वहां पर गिरफ्तार किया है।
इसके बाद उन्हें अखबार से ही पता चला कि साहिब सिंह 14 सितंबर 1992 को पुलिस मुठभेड़ में तीन और लोगों के साथ मारा गया। वह जब अन्य ग्रामीणों के साथ पुलिस स्टेशन गए तो मुंशी ने उन्हें बताया कि साहिब सिंह का अंतिम संस्कार किया जा चुका है। इसके बाद वह उसकी अस्थियां लेकर आए।
इससे घातक अपराध नहीं हो सकता था
पीड़ित परिवारों के एडवोकेट जगजीत सिंह बाजवा व सतनाम सिंह बैंस ने कहा कि इससे बड़ा घातक अपराध नहीं हो सकता है। अदालत में पुलिस की सारी कहनी कमजोर पड़ गई। मृतकों की पोस्टमार्टम रिपोर्ट से यह साफ हो गया था कि इन्हें सीधे छाती में गोली मारी गई है। 30 साल इन चीजों को सामने आने में लग गए।