मोहाली। 2010 में बेटा हरआशीष बीमारी के चलते पीजीआई में दाखिल था। साथ के कमरे में 12 साल का बच्चा था, जिसके दिल में सुराख का इलाज चल रहा था। अचानक बच्चे की मौत हो गई। परिजनों को रोते-बिलखते देख अस्पताल स्टाफ से बच्चे की मौत का कारण पूछा तो पता चला कि इलाज के पैसों का इंतजाम न होने से मौत हो गई। यह सुनकर मन पसीज गया। यहीं से मैंने इंसानियत का पाठ पढ़ा और तय किया कि हर जरूरतमंद की मदद करूंगा। करीब 12 साल से लोगों की मदद करने का सफर जारी है। यह बात उद्योगपति और समाजसेवी गुरप्रीत सिंह ने कही।
उन्होंने बताया कि परिवार के सदस्यों के साथ अपनी कंपनी के मुलाजिमों को भी इस कार्य में लगा दिया। लोगों की मदद की शुरुआत पीजीआई से ही शुरू की थी। पीजीआई के डॉक्टरों के साथ अपना नंबर साझा किया और कहा कि अस्पताल में आने वाले मरीज के तीमारदारों को दवाई खरीदने के लिए पैसों की कमी आती है तो वेे उनकी मदद करेंगे। जरूरतमंदों तक उनका नंबर पहुंचा दिया जाए। यह सिलसिला कुछ वर्षों तक चला। इसी दौरान अस्पताल में एक व्यक्ति मिला, जिसे अपने जानकार का शव सैकड़ों किलोमीटर दूर गांव में ले जाना था। पैसों की कमी के चलते रेहड़ी में शव लेकर जा रहा था। यह देख उन्होंने एंबुलेंस मुहैया करवाई। इसके बाद एक दोस्त, रिश्तेदारों के साथ मिलकर एक एंबुलेंस खरीदी, जिसका फायदा जरूरतमंद उठा रहे हैं।
450 स्कूलों को गोद लेकर पहुंचा रहे हैं मदद
2010 में पीजीआई से शुरू हुआ सफर आगे चलकर सरकारी स्कूलों में पढ़ने वाले छात्रों के साथ जुड़ गया। गुरप्रीत सिंह ने एक संस्था बनाकर सरकारी स्कूल में गरीब परिवार के बच्चों को स्टेशनरी और बुनियादी सुविधाओं का अभाव झेल रहे स्कूलों में पंखे, वाटर कूलर, एलईडी और बेंच देना शुरू कर दिया। संस्था पंजाब और कर्नाटक में 450 स्कूलों को गोद ले लिया हैं और मूलभूत सुविधाएं मुहैया कर रही है।
रक्त की कमी पूरा करने के लिए लगाने शुरू किए शिविर
पीजीआई में आने वाले मरीजों के लिए रक्त की बहुत कमी थी। लोगों के पास पैसा होने के बावजूद रक्त नहीं मिलता था। इस समस्या को दूर करने के लिए 2018 में रक्तदान शिविर लगाने का फैसला लिया। पहले शिविर में 182 यूनिट रक्त एकत्रित हुआ। इसके बाद रक्तदान शिविर हर 3 महीनों में आयोजित करने का फैसला लिया। अब तक 24 रक्तदान शिविर आयोजित कर चुके हैं। कोरोना काल में शिविरों की रोक के बावजूद सेवा करनी नहीं छोड़ी।