पंजाब में सभी दलों की एकजुटता के कारण पंजाब के विधानसभा चुनाव अब 14 फरवरी के बजाय 20 फरवरी को होंगे। पंजाब में दलितों की आबादी 32 फीसदी है और यह 58 विधानसभा हलकों में सीधा प्रभाव डालती है। यही वजह है कि पंजाब में अब राजनीतिक दलों में इसका श्रेय लेने की होड़ मची हुई है।
दलित वोट आमतौर पर कांग्रेस और शिरोमणि अकाली दल के बीच बंटता रहा है। बीच में बीएसपी ने इसमें सेंध लगाने की कोशिश की, लेकिन उसे भी एकतरफा समर्थन नहीं मिला। 2002 में कांग्रेस के 14 दलित प्रत्याशी विधानसभा पहुंचे थे, जबकि अकाली दल के 12 प्रत्याशी चुनाव जीते थे। वहीं, दलित सीटों पर भारतीय जनता पार्टी भी समय-समय पर उपस्थिति दिखाती रही है। दीनानगर, नरोट मेहरा, जालंधर साउथ और फगवाड़ा रिजर्व सीटों पर भाजपा चुनाव लड़ी थी, लेकिन एक भी सीट नहीं मिली। साफ है कि दलितों ने कांग्रेस व अकाली दल को करीब करीब बराबर रखा, लेकिन भाजपा को नकार दिया था। 2007 में दलितों ने कांग्रेस से मुंह फेर लिया और पार्टी सत्ता में नहीं आ पाई। 2012 में भी दलितों ने कांग्रेस के स्थान पर अकाली दल का साथ देना बेहतर समझा, लिहाजा पंजाब में शिअद भाजपा गठबंधन दोबारा सरकार बनाने में कामयाब रहा। पंजाब में 2017 में चुनावों में त्रिकोणीय मुकाबला हुआ, आम आदमी पार्टी ने दलित वोट बैंक में सेंध लगाई और पहली बार विधानसभा चुनाव लड़कर 9 दलित विधायक जीतकर विधानसभा पहुंचे और अकाली दल महज 3 पर आ गया, जबकि कांग्रेस ने 21 सीटें जीतीं। मतलब साफ है कि जिस पार्टी का दलित सीटों पर पताका फहराया, वह पार्टी विधानसभा में काबिज हुई है। ऐसा नहीं कि दलितों का प्रभाव केवल दोआबा में है, दलितों का वोट पूरे पंजाब में है। दोआबा में 37 फीसदी, मालवा में 31 फीसदी और माझा में 29 फीसदी दलित आबादी है। यह भी साफ है कि दलित वोटरों ने किसी एक पार्टी का दामन पक्के तौर पर नहीं थामा है। वोट बंटे, लेकिन एक पार्टी की तरफ नहीं गए। यहां तक कि बसपा भी पूर्ण रूप से दलितों के वोट को एकतरफा नहीं कर पाई। हालांकि यहां से बसपा संस्थापक कांशी राम भी चुनाव लड़ चुके हैं।
पंजाब के मुख्यमंत्री चरणजीत सिंह चन्नी ने चुनाव आयोग को चिट्टी लिखकर सुझाव दिया था कि 14 फरवरी को होने वाले विधानसभा चुनाव गुरु रविदास जयंती को ध्यान में रखते हुए कम से कम छह दिनों के लिए टाल दिए जाने चाहिए। मतदान की तारीख के दो दिन बाद 16 फरवरी को रविदास जयंती है। पंजाब के सीएम ने पत्र में लिखा था कि अनुसूचित जाति समुदाय के प्रतिनिधियों, जिसमें पंजाब की आबादी का 32 प्रतिशत शामिल है, ने उन्हें बताया है कि रविदास जयंती की वजह से बड़ी संख्या में समुदाय के लोग 10 से 16 फरवरी को वाराणसी जाते हैं। ऐसे में कई लोग विधानसभा चुनाव के लिए वोट नहीं डाल पाएंगे, जो संवैधानिक अधिकार है। बीजेपी और उसकी सहयोगी कैप्टन अमरिंदर सिंह की पार्टी पंजाब लोक कांग्रेस ने भी चुनाव आयोग को खत लिखकर पंजाब में 14 फरवरी को होने वाले मतदान को आगे बढ़ाने का आग्रह किया था। राष्ट्रीय अनुसूचित जाति आयोग के चेयरमैन विजय सांपला ने भी सोमवार को पत्र लिखा था कि लाखों लोग गुरु पर्व मनाने उत्तर प्रदेश के बनारस जाएंगे। इसलिए उनके लिए मतदान प्रक्रिया में भाग लेना संभव नहीं होगा। केंद्रीय राज्यमंत्री सोमप्रकाश ने भी वीडियो जारी कर कहा कि उन्होंने चुनाव आयोग को पत्र लिखा था कि चुनाव तिथि को आगे किया जाए।