पंजाब में विधानसभा चुनाव का बिगुल बज चुका है और पार्टियों की तरफ से उम्मीदवारों की घोषणा की जा रही है लेकिन इस बार माहौल बदला हुआ है। पंजाब के चुनावों में अहम भूमिका अदा करने वाले एनआरआई इस बार चुनावों से दूर हैं। एनआरआई जहां विशेष तौर पर पंजाब में प्रचार के लिए आते थे लेकिन इस बार उनकी संख्या ना के बराबर है। पंजाब की राजनीतिक पार्टियों के लिए दिसंबर माह में विदेशी टूर पर जाकर पार्टी का प्रचार व फंड एकत्रित करते थे, वह भी सिस्टम नहीं है। तमाम पार्टियों के एनआरआई विंग बिल्कुल ठंडे हो चुके हैं। पंजाब का दोआबा एनआरआई का गढ़ है और उनका 34 सीटों पर खासा प्रभाव है।
पंजाब के चुनावों में एनआरआई की अहम भूमिका को देखते हुए सारे नेताओं में विदेशी टूर का क्रेज होता था। कैप्टन अमरिंदर सिंह, राणा गुरजीत सिंह, केवल सिंह ढिल्लो आदि की टीम विदेशों में पहुंच जाती थी। वहां पर न केवल प्रचार किया जाता था बल्कि फंड भी एकत्रित किया जाता था। सुखबीर बादल भी एनआरआई सुरजीत सिंह रखड़ा को आगे रखकर विदेशों में अपना टूर तैयार करते थे। पिछली बार तो अरविंद केजरीवाल ने भी पंजाब चुनावों के लिए विदेश का टूर लगाया था। कैप्टन अमरिंदर सिंह अपनी टीम के साथ अमेरिका गए और वहां पर प्रचार किया था। इसके बाद पूर्व केंद्रीय राज्यमंत्री परनीत कौर के अलावा पंजाब कांग्रेस प्रभारी आशा कुमारी भी विदेश गई और वहां पर जाकर प्रचार किया।
दिल्ली के सीएम अरविंद केजरीवाल भी 2016 में छह सितंबर को रोम की यात्रा पर गए। वहीं शिअद के मंत्री तोता सिंह, सुरजीत सिंह रखड़ा ने भी विदेशों में जाकर एनआरआई पर खूब डोरे डाले और उनको शिअद की मुहिम शुरू करने के लिए प्रेरित किया। लेकिन इस बार कोई भी नेता विदेशी टूर नहीं कर रहा है। वहीं एनआरआई इस बार पंजाब की किसी राजनीतिक पार्टी को ज्यादा तवज्जो नहीं दे रहे हैं।
कनाडा की राजधानी ओटावा के नामवर जसविंदर सिंह जस्सा का कहना है कि एनआरआई का पंजाब के चुनावों से मोह भंग हो चुका है। पहले कनाडा से लेकर अमेरिका तक माहौल गर्मा जाता था। चुनाव पंजाब में होते थे लेकिन पार्टियों का दौर कनाडा में चलता था। एनआरआईज के लिए किसी सरकार ने कुछ नहीं किया है। आज भी एनआरआई अदालती केसों में उलझे हुए हैं।
अमेरिका में परिवार सहित शिफ्ट हुई मंजीत कौर संघा का कहना है कि पंजाब अपनी धरती है। प्यार व दिल पंजाब से लगाव रखता है। पिछले चुनावों में वह पंजाब आई थी लेकिन इस बार नहीं आना है। पंजाब में अब पुराना राजनीतिक माहौल नहीं रहा है। बेअदबी, ड्रग व बेरोजगारी की घटनाओं से दिल दुखी होता है पर कोई सुधार करता ही नहीं है।