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शहादत को भूली सरकार: जालंधर के कारगिल शहीद दलजीत सिंह के परिवार का दर्द, सरकार ने नहीं दिया सम्मान

Wed, 26 Jul 2023 10:53 AM IST
निवेदिता वर्मा सुरिंदर पाल, अमर उजाला, जालंधर (पंजाब)

सार

दलजीत सिंह केवल 26 वर्ष के थे, जब 11 जुलाई 1999 को उन्होंने शहादत का जाम पिया था। शहीद दलजीत सिंह के पिता किरपाल सिंह ने बताया कि दलजीत की शहादत के बाद उसके हाथ का लिखा पत्र उन्हें चार पांच दिन बाद मिला था, जिसमें उन्होंने अपनी पत्नी से परिवार का ख्याल रखने के लिए कहा था क्योंकि युद्ध में उनके साथ कुछ भी हो सकता था।
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शहीद दलजीत सिंह की फोटो के साथ उनके माता-पिता - फोटो : संवाद न्यूज एजेंसी।
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विस्तार
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24 साल पहले हुए कारगिल युद्ध में जालंधर के सिपाही दलजीत सिंह ने भी शहादत का जाम पिया था। 15 हजार फीट ऊंची पहाड़ी कारगिल में शहीद होने वाले सिपाही दलजीत सिंह के परिवार को इस बात का मलाल है कि पिछले 24 साल में उनको पंजाब सरकार की तरफ से कोई पूछने तक नहीं आया है। 
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जब 1999 में दलजीत शहीद हुए थे तो पंजाब सरकार ने रामामंडी से लेकर जंडू सिंगा तक के मार्ग को शहीद दलजीत सिंह मार्ग घोषित किया था और बाकायदा बोर्ड भी लगाए थे। इस दौरान होशियारपुर मार्ग चौड़ा हुआ और बोर्ड उतारकर रख दिए गए। किसी अधिकारी ने इस बारे में ध्यान नहीं दिया कि इस मार्ग को शहीद दलजीत सिंह मार्ग के नाम से जाना जाता है और वहां पर बोर्ड लगाने हैं।

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26 साल के दलजीत ने दी थी शहादत
दलजीत सिंह केवल 26 वर्ष के थे, जब 11 जुलाई 1999 को उन्होंने शहादत का जाम पिया था। शहीद दलजीत सिंह के पिता किरपाल सिंह ने बताया कि दलजीत की शहादत के बाद उसके हाथ का लिखा पत्र उन्हें चार पांच दिन बाद मिला था, जिसमें उन्होंने अपनी पत्नी से परिवार का ख्याल रखने के लिए कहा था क्योंकि युद्ध में उनके साथ कुछ भी हो सकता था।

मां कमलजीत कौर का कहना है कि उन्हें याद है कि वह जब घर आया था तो ठीक नहीं था और बीमारी की छुट्टी पर घर आया था। जब युद्ध छिड़ गया, तो उसने वापस जाने पर जोर दिया। उसके पिता किरपाल सिंह जम्मू रेलवे स्टेशन तक गए और फिर उनसे पूछा कि अब कहां जाना है। तब दलजीत ने कहा कि उन्हें वापस जाना चाहिए क्योंकि जब लोग देखेंगे कि एक सिपाही अपने पिता के साथ आया है तो वे उसके बारे में क्या सोचेंगे।

शहादत के बाद घर आए थे सीएम बादल
मां कमलजीत कौर बताती है कि जब बेटा शहीद हुआ तो सीएम बादल घर आए थे और बाद में 15 अगस्त को उनके दूसरे बेटे कुलदीप सिंह को गुरु गोबिंद सिंह स्टेडियम में नौकरी पत्र दे दिया, लेकिन बाद में वे पीछे-पीछे घुमाने लग गए। उनके बेटे कुलदीप सिंह को नौकरी नहीं दी गई और आखिरकार हाईकोर्ट जाना पड़ा। जहां पर केस लड़ने के बाद कुलदीप सिंह को चपरासी की नौकरी मिली। मां कहती है कि सरकार सिर्फ कहती है करती कुछ नहीं है, आज तक कोई घर पूछने तक नहीं आया है।
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पिता किरपाल सिंह का दुख बहुत है। उनका कहना है कि सीएम बादल ने रामामंडी चौक से लेकर जंडू सिंगा तक की सड़क का नाम शहीद दलजीत सिंह के नाम पर रखा था। तीन स्थान पर बोर्ड लगाए गए थे लेकिन कई साल हो गए, अब एक भी बोर्ड नहीं है। सड़क चौड़ी करने वालों ने कई साल पहले इन्हें उतारकर रख दिया है, बार-बार कह रहे हैं कितने साल बीत गए कोई लगा ही नहीं रहा है। उनके बेटे की शहादत को भुलाया जा रहा है, शहादत ऐसे नहीं मिलती है।
 
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