महिलाओं को अक्सर घर संभालने तक ही सीमित रखा जाता है, लेकिन कुछ ने संघर्ष कर अपनी दास्तां खुद लिखी है। इनमें से ही एक हैं जालंधर की एंबुलेंस चालक मंजीत कौर। मंजीत 16 साल से एंबुलेंस चला रही हैं। जब भी गाड़ी चलाने की बात आती है, तो यही कहा जाता है कि महिलाएं अच्छी चालक नहीं होती हैं। ऐसी सोच वाली मानसिकता के लोगों को मंजीत ने करारा जवाब दिया है। 2007 में मंजीत कौर ने नॉन एसी एंबुलेंस खरीदी और सिविल अस्पताल जालंधर में खड़ी करने लगीं।
कोविड-19 में जब लोग घरों में कैद हो गए थे तब मंजीत बाहर निकलीं और स्टाफ के साथ सैकड़ों मरीजों को अस्पताल पहुंचाया। कोविड में जब दिल्ली-गुरुग्राम में ऑक्सीजन खत्म हुई तो वहां से मरीजों को निकालकर जालंधर लाई। मंजीत कौर का कहना है कि जब बुरा दौर चल रहा था तो मैंने अपनी एंबुलेंस बेची थी। हौसले टूटे थे, लेकिन आत्मविश्वास नहीं टूटने दिया। खुद की एंबुलेंस नहीं थी फिर भी निजी अस्पताल में सेवाएं देते हुए रात की ड्यूटी पर साढ़े तीन हजार के करीब कोविड मरीजों को अस्पताल व शवों को घरों तक पहुंचाया।
तीन अक्तूबर 1978 को कपूरथला जिले के गांव मंडी मोड़ के किसान परिवार में जन्मी मंजीत कौर को बचपन में ‘रानी’ नाम से पुकारा जाता था। बीमारी से परेशान पिता हीरा सिंह ने 15 साल की उम्र में एक शराबी युवक के साथ शादी कर दी। 1998 में पिता हीरा सिंह और 2004 में मां राज कौर की मौत हो गई। ससुराल में हालात पहले से ही ठीक नहीं थे। एक दिन पति ने महज 200 रुपये की खातिर दो आदमियों को मकान में घुसा दिया। घर की छत से कूदकर इज्जत बचाई। भाई चाहते थे कि मैं अपना इकलौता बेटा और शराबी पति को छोड़कर मायके में उनके पास जाकर रहूं। साथ नहीं रहने को लेकर भाइयों ने संपत्ति के लिए कोर्ट में केस कर दिया। इसके बाद हालात यह हो गए कि लोगों के घरों में काम तक करना पड़ा।
परेशानियां बढ़ीं तो शौक के लिए ड्राइविंग सीख ली जो उनके लिए वरदान बनकर सामने आई। दिन में ड्राइविंग स्कूल, रात की ड्यूटी पर एंबुलेंस चला रही हैं। पहले जालंधर में किराए पर रहा करती थीं, लेकिन जब से बेटे को दुबई भेजा है रिहायश भी बदल गई है। अब मंजीत कौर लांबडा के अंतर्गत आते गांव बाजना में रह रही हैं। ड्राइविंग स्कूल शुरू करने की वजह पैसों की तंगी थी, लेकिन उतार-चढ़ाव के बाद जिंदगी पटरी पर लौट आई है।