बठिंडा में सद्भावना रैली के जरिये पंजाब के डिप्टी सीएम व शिअद प्रमुख सुखबीर सिंह बादल ने एक तीर से दो शिकार किए हैं।
उन्होंने रैली में भाजपा को साथ लेकर केंद्र व जनता में अपना विश्वास जीतने की पूरी कोशिश की। रैली से उन्होंने सरबत खालसा विवाद के बाद उन लोगों की जुबान बंद करने का प्रयास भी किया जो पंजाब में शिअद का जनाधार खिसकने की बात कर रहे थे।
बेशक रैली को सफल बनाने के लिए सरकारी तंत्र और शिअद ने पूरी ताकत झोंक दी, लेकिन इससे शिअद वर्करों में नए सिरे से उत्साह दिखा है।
मालवा में सफल सद्भावना रैली के बाद शिअद का अगला पड़ाव दोआबा है। चार दिसबंर को नकोदर में सद्भावना रैली की तैयारियां पार्टी ने अभी से शुरू कर दी हैं।
नकोदर में शिअद के विधायक गुरप्रताप सिंह वडाला हैं। सुखबीर ने दिग्गज मंत्री अजीत सिंह कोहाड़ को मैदान में उतार दिया है।
पंजाब में श्री गुरू ग्रंथ साहिब की बेअदबी और उससे पहले श्री अकाल तख्त साहिब की ओर से डेरामुखी संत गुरमीत राम रहीम को अचानक माफी दिए जाने की घटना से आहत सिख समुदाय ने जिस तरह से रोष व्यक्त किया था, उससे अकाली दल बैकफुट पर आ गया था।
अमृतसर में 10 अक्तूबर को हुए चरमपंथियों के सरबत खालसा में भारी भीड़ देखकर शिअद वर्करों व नेताओं का मनोबल गिरने लगा था। बिगड़े माहौल के कारण शिअद नेता धार्मिक व सामाजिक कार्यक्रमों से दूरी बनाने लगे थे और शिअद के जनाधार गिरने की चर्चा शुरू हो गई थी।
वहीं केंद्र में सत्तासीन भाजपा सरकार भी पंजाब के बिगड़े हालात को लेकर चिंतित थी। भाजपा का प्रदेश नेतृत्व तो केंद्रीय मंत्री राजनाथ सिंह से मिलकर उन्हें सूबे के हालात पर रिपोर्ट देकर आया था।
सरबत खालसा को कट्टरपंथियों का सम्मेलन साबित करने में जुटे सुखबीर ने केंद्र सरकार के समक्ष पूरे सबूत रखे थे कि किस तरह वहां अलगाववादी नारे लगाए गए और आतंकी हवारा को जत्थेदार नियुक्त किया गया।
सद्भावना रैली को कामयाब करने के लिए सरकारी मशीनरी ने पूरी ताकत झोंकी। दोआबा व माझा से भारी संख्या में स्कूल बसों को रैली के लिए रवाना किया गया। इतना ही नहीं दोआबा से काफी संख्या में सिविल वर्दी में मुलाजिमों को भी रैली स्थल तक भेजा गया।