आज 23 मार्च है और ये तारीख भारतीय इतिहास के कैलेंडर पर केवल अंकों का मेल नहीं बल्कि उस इंकलाब की गूंज है जिसने अंग्रेजी हुकूमत की नींव हिला दी थी। 1931 में आज के दिन भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरु ने देश के लिए सर्वोच्च बलिदान दिया था। लेकिन इस शहादत का एक ऐसा अध्याय भी है, जो सात समंदर पार लंदन की जेल में लिखा गया, जहां अपनी मौत के मुहाने पर खड़े शहीद ऊधम सिंह खुद के लिए नहीं बल्कि अपने दोस्त भगत सिंह की याद में तड़प रहे थे।
बरिक्स्टन जेल से छलका था दर्द
30 मार्च 1940 को शहीद ऊधम सिंह ने लंदन की बरिक्स्टन जेल से अपने मित्र शिव सिंह जौहल को एक पत्र लिखा था। इस पत्र की एक-एक पंक्ति उस महान क्रांतिकारी के साहस और उनके भीतर छिपी गहरी संवेदनाओं को बयां करती है। उन्होंने लिखा था कि "मैं मौत से नहीं डरता। 10 साल पहले मेरा दोस्त (भगत सिंह) मुझे छोड़कर चला गया था। मुझे पूरा यकीन है कि मरने के बाद मैं उससे जरूर मिलूंगा और वह भी मेरा इंतजार कर रहा होगा।"
23 मार्च का वो बेचैन सन्नाटा
इतिहास के पन्नों में दर्ज है कि जेल की कालकोठरी में ऊधम सिंह के लिए 23 मार्च की तारीख किसी अग्निपरीक्षा से कम नहीं थी। अपनी शहादत का अंदेशा जताते हुए उन्होंने पत्र में लिखा था कि चूंकि उनके दोस्त को 23 तारीख को फांसी दी गई थी, इसलिए उन्हें उम्मीद है कि उन्हें भी इसी तारीख को शहादत नसीब होगी। अपने क्रांतिकारी साथी की शहादत की याद में उन्होंने उस दिन अन्न का एक दाना भी नहीं चखा। पूरा दिन उन्होंने किसी से कोई बात नहीं की। उनके चेहरे पर एक अजीब सी बेचैनी और आंखों में अपने बिछड़े साथी के प्रति गहरा दर्द साफ झलकता था।
सुनाम के पैतृक घर में कैद हैं ये भावुक यादें
शहीद ऊधम सिंह के मन की इस तड़प और उनके क्रांतिकारी विचारों के गवाह वो ऐतिहासिक पत्र आज भी सुनाम स्थित उनके पैतृक घर में सुरक्षित रखे हुए हैं। ये पत्र महज कागज के टुकड़े नहीं, बल्कि दो महान क्रांतिकारियों के बीच उस रूहानी दोस्ती का प्रमाण हैं, जिसने आजादी की मशाल को कभी बुझने नहीं दिया। आज जब पूरा देश शहीद-ए-आजम भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरु को नमन कर रहा, तब सुनाम की धरती पर शहीद ऊधम सिंह की उस बेबसी और शहादत के प्रति उनके जुनून को भी शिद्दत से याद किया जा रहा है।