डोनाल्ड ट्रंप और जो बिडेन
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अब समझिए, प्राइमरी क्या है और इसमें क्या होता है?
कॉकस से अलग प्राइमरी का संचालन नियमित पोलिंग स्टेशन पर होता है। आम तौर पर इसके लिए भुगतान स्टेट करता है और संचालन राज्य निर्वाचन अधिकारी करते हैं। वोटर्स सामान्य तौर पर गोपनीय बैलट के जरिए पसंद के उम्मीदवार को वोट करते हैं।
समान्य तौर पर प्राइमरी दो तरह की होती हैं- क्लोज्ड प्राइमरी जिसमें केवल पार्टी के रजिस्टर्ड वोटर्स हिस्सा लेते हैं। दूसरी है ओपन प्राइमरी। इसमें किसी भी पार्टी का सदस्य होना जरूरी नहीं है। 1970 के दशक के पहले ज्यादातर राज्यों में डेलिगेट्स का चुनाव कॉकस के जरिए होता था, लेकिन 1972 में सुधार के बाद नामांकन प्रक्रिया को ज्यादा समावेशी और पारदर्शी बनाया गया। इसके बाद ज्यादातर राज्यों ने प्राइमरी को अपना लिया।
2016 में केवल 14 राज्यों (अलास्का, कोलारैडो, हवाई, आइडहो, आयोवा, कैंजस, केन्टकी, मेईन, मिनासोटा, नर्बास्का, नेवाडा, नॉर्थ दकोटा, वॉशिंगटन और वॉयमिंग) के साथ डिस्ट्रिक्ट ऑफ कोलंबिया और चार यूएस इलाके (अमेरिकन समोआ, नॉर्दन मरिआना, पुअर्तो रिको और यूएस वर्जिन आईलैंड्स) में कॉकस का आयोजन किया गया।
आयोवा कॉकस क्यों और किस वजह से अहम है?
1970 के दशक में कई ऐसी घटनाएं हुईं जिससे आयोवा कॉकस को राजनीतिक तौर पर और भी ज्यादा अहमियत हासिल हुई। पहला, शिकागो में 1968 के नेशनल कन्वेंशन के बाद डेमोक्रेटिक पार्टी ने सुधार प्रक्रिया शुरू की थी।
उन दिनों युद्ध विरोधी प्रदर्शनकारी हिंसक हो गए थे। पार्टी आलाकमान की शक्ति को सीमित करने की प्रक्रिया शुरू हुई और नियमित सदस्यों के बीच नॉमिनेशन प्रक्रिया को ज्यादा पारदर्शी बनाया गया। अन्य मामलों में डेलिगेट्स की चयन प्रक्रिया को समयबद्ध किया गया। 1972 में आयोवा में कॉकस मार्च या अप्रैल में होता था, जो अब न्यू हैंपशायर से ठीक पहले जनवरी में होता है।