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US Elections 2020: जानें कैसे होता है अमेरिका में चुनाव और हर सवाल का जवाब

Tue, 03 Nov 2020 12:10 AM IST
योगेश साहू वर्ल्ड डेस्क, अमर उजाला, वॉशिंगटन/नई दिल्ली।
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अमेरिकी राष्ट्रपति चुनाव 2020 : डोनाल्ड ट्रंप और जो बिडेन - फोटो : amar ujala
अमेरिका में राष्ट्रपति पद पर चुनाव के लिए तीन नवंबर को मतदान होना है। इस चुनावी मैदान में रिपब्लिकन पार्टी की ओर से डोनाल्ड ट्रंप और डेमोक्रेटिक पार्टी की ओर जो बिडेन को उम्मीदवार बनाया गया है। बहरहाल, सबसे अहम बात यह है कि अमेरिका में आखिर राष्ट्रपति कैसे चुने जाते हैं? इसकी पूरी प्रकिया क्या है? कब कैसे मतदान होता है? उम्मीदवार को जीतने के लिए कितने वोट की जरूरत होती है? यहां आपके ऐसे ही सवालों के जवाब मौजूद हैं...

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US Election - फोटो : PTI
सबसे पहले ये जानिए
साल 2016 के राष्ट्रपति चुनाव में हिलेरी क्लिंटन को करीब 29 लाख से अधिक लोगों ने वोट किया, फिर भी वो चुनाव हार गईं और डोनाल्ड ट्रंप राष्ट्रपति बने। ऐसा इसलिए हुआ क्योंकि ट्रंप के पक्ष में इलेक्टोरल कॉलेज रहा। इलेक्टोरल कॉलेज की व्यवस्था अमेरिका के संविधान में है।

इलेक्टोरल कॉलेज के 270 वोट का जादुई अंक काफी अहम है और राष्ट्रपति बनने के लिए इसे हासिल करना जरूरी होता है। अगर इस बार भी यह डोनाल्ड ट्रंप के पक्ष में जाता है तो जो बिडेन के लिए यह बात निराशाजनक होगी। ट्रंप 270 के जादुई अंक तक कई रास्तों से पहुंच सकते हैं।
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डोनाल्ड ट्रंप - फोटो : ANI
ऐसा हुआ तो ट्रंप फिर से जीत सकते हैं..
यदि ट्रंप फ्लोरिडा, पेंसिल्वेनिया जीत जाते हैं और उत्तरी कैरोलीना के साथ अरिजोना, जॉर्जिया, ओहायो को भी अपने नियंत्रण में रखते हैं तो उनकी राह 2016 की तरह ही आसान हो जाएगी। लेकिन इस बार कहा जा रहा है कि लड़ाई आसान नहीं है। फ्लोरिडा में 29 इलेक्टोरल वोट हैं और इसे ट्रंप के लिए सबसे मुश्किल बताया जा रहा है। अगर ट्रंप यहां हारते हैं तो दोबारा राष्ट्रपति बनना संभव नहीं होगा।

अमेरिका की कमान डोनाल्ड ट्रंप के पास ही रहेगी या जो बिडेन के पास ये कुछ ही हफ्तों में पता चल जाएगा। लेकिन इस नतीजे तक पहुंचने की प्रक्रिया बेहद थकाऊ और जटिल है। इसके लिए प्रचार अभियान भी बहुत महंगा साबित होता है।

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US Election - फोटो : Social Media
अब जानते हैं अमेरिका में राष्ट्रपति का चुनाव कैसे होता है?
जब अमेरिका राष्ट्रपति का चुनाव करता है तो वह शख्स केवल स्टेट प्रमुख ही नहीं होता बल्कि वह सरकार का भी मुखिया होता है और दुनिया की सबसे बड़ी सेना का कमांडर-इन-चीफ भी होता है। अगर आप भारत के आम चुनाव की तर्ज पर अमरीकी राष्ट्रपति चुनाव को समझने की कोशिश कर रहे हैं तो गच्चा खा जाएंगे।

भारत में बड़ी पार्टियां जैसे कांग्रेस और भारतीय जनता पार्टी या तो प्रधानमंत्री उम्मीदवार की घोषणा कर देती हैं या चुनावी नतीजे आने के बाद इस पर फैसला होता है। अमेरिका में ठीक इसके उलट है। यहां की दोनों प्रमुख पार्टियां रिपब्लिकन और डेमोक्रेटिक पार्टी राष्ट्रपति उम्मीदवार के चयन को लेकर भी जनता के बीच जाती हैं।

दोनों पार्टियों में उम्मीदवार बनने की चाहत रखने वाले लोग हर स्टेट में प्राइमरी और कॉकस इलेक्शन में हिस्सा लेते हैं। प्राइमरी और कॉकस चुनाव में जो जीतता है वह दोनों पार्टियों की ओर से औपचारिक उम्मीदवार बनता है।
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US Election - फोटो : Amar ujala
कैसे बना जा सकता है अमेरिका का राष्ट्रपति?
अमेरिका में राष्ट्रपति का चुनाव लड़ने के लिए नियम के मुताबिक जन्म से अमेरिका का नागरिक होना होता है। उम्र भी कम से कम 35 साल होनी चाहिए और 14 साल से वहां का निवासी होना चाहिए। 

यह बड़े ही साधारण से नियम जान पड़ते हैं, परंतु सच यह है कि 1933 से अब तक अमेरिका का हर राष्ट्रपति एक गवर्नर, सीनेटर या फाइव स्टार सैन्य जनरल रहा है। जैसे ही किसी शख्स के नाम पर उम्मीदवार बनाने को लेकर विचार किया जाता है, वैसे ही उसे मीडिया की खबरों में जगह मिलनी शुरू हो जाती है।

2016 के चुनाव में एक समय तक 10 गवर्नर और पूर्व गवर्नर के अलावा 10 सीनेटर और पूर्व सीनेटर उम्मीदवारी हासिल करने उतरे थे। हालांकि आखिर में दोनों पार्टियों की तरफ से एक-एक उम्मीदवार मैदान में होते हैं।

चुनाव में राष्ट्रपति पद के लिए नामांकन प्रक्रिया भी सबसे जटिल, लंबी और महंगी मानी जाती है। हर चार साल बाद डेमोक्रेटिक और रिपब्लिकन पार्टी की उम्मीदवारी हासिल करने की चाहत रखने वाले लोग सर्दियों और वसंत ऋतु के दौरान आम चुनाव से पहले सभी राज्यों में प्राइमरी और कॉकस चुनाव का सामना करते हैं।
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डोनाल्ड ट्रंप-जो बाइडेन (फाइल फोटो) - फोटो : Amar Ujala
पार्टी का औपचारिक उम्मीदवार बनना
हर राज्य में प्राइमरी और कॉकस चुनाव जीतने के बाद इन्हें निश्चित संख्या में डेलिगेट्स का समर्थन हासिल होता है। जो उम्मीदवार महीनों चलने वाली इस प्रक्रिया में अपनी पार्टी के डेलिगेट्स की तय संख्या अपने पक्ष में कर लेता है, वह नॉमिनेशन हासिल कर लेता है। मतलब वह पार्टी का औपचारिक उम्मीदवार बन जाता है।

ज्यादातर राष्ट्रपति पद के उम्मीदवार आयोवा और न्यू हैंपशायर जैसे राज्यों में अनौपचारिक रूप से प्राइमरी इवेंट्स के एक साल पहले ही प्रचार अभियान शुरू कर देते हैं। इसीलिए कहा जाता है कि अमेरिका में कभी चुनावी कैंपेन खत्म नहीं होता है। नॉमिनेशन प्रक्रिया के तहत इन्हीं दो राज्यों से प्राइमरी और कॉकस चुनाव की शुरुआत होती है।

साल 2016 में प्राइमरी कैलेंडर की शुरुआत एक फरवरी से हुई थी। एक फरवरी को ही रिपब्लिकन और डेमोक्रेटिक पार्टी ने आयोवा कॉकस का आयोजन किया था। 1970 के दशक में अमेरिका में पार्टियों ने नॉमिनेशन प्रक्रिया को और पारदर्शी बनाया। संभावित उम्मीदवार की तस्वीर अब काफी पहले साफ हो जाती है। एक वक्त था जब वोटिंग के कुछ हफ्ते पहले तस्वीर साफ होती थी।
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अमेरिका: राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप - फोटो : PTI
क्या है कॉकस, क्या है इसका प्रयोजन?
कॉकस का आयोजन स्कूल, जिम, टाउन हॉल समेत अन्य सार्वजनिक स्थानों पर होता है। कॉकस एक तरह की स्थानीय बैठक है। इनका आयोजन दोनों प्रमुख पार्टियां करती हैं। आयोजन में होने वाले खर्च भी पार्टियां ही उठाती हैं। बैठक में रजिस्टर्ड पार्टी मेंबर्स जुटते हैं और राष्ट्रपति उम्मीदवारों के चयन को लेकर समर्थन देने पर बात करते हैं।

दोनों प्रमुख पार्टियां इसे अलग-अलग तरीके से करती हैं। मिसाल के तौर पर 2016 के अयोवा कॉकस में रिपब्लिकन्स ने पसंदीदा उम्मीदवार के लिए गोपनीय बैलट का इस्तेमाल किया था, जबकि डेमोक्रेट्स ने ग्रुप में बंटकर अपने पसंदीदा प्रत्याशी का समर्थन किया।

डेमोक्रेटिक प्रत्याशी को डेलिगेट्स हासिल करने के लिए कुल आए लोगों का एक निश्चित प्रतिशत में समर्थन पाना जरूरी है। कॉकस में हिस्सा लेने वाले लोग तकनीकी रूप से राष्ट्रपति प्रत्याशी नहीं चुनते हैं, बल्कि वे डेलिगेट्स का चुनाव करते हैं। ये डेलिगेट्स फिर कन्वेंशन स्तर पर अपने उम्मीदवार के पक्ष में मतदान करते हैं।

डेलिगेट्स नेशनल कन्वेंशन के लिए राज्य से और कांग्रेसनल डिस्ट्रिक्ट कन्वेंशन से चुने जाते हैं। कॉकस को कोई आधुनिक राष्ट्रपति नामांकन के लिए विकसित नहीं किया गया है, बल्कि अमेरिका में राजनीतिक पार्टियां इसका पहले से इस्तेमाल करती रही हैं। आयोवा जैसे राज्य में हर दूसरे साल पर कॉकस का आयोजन होता है। हालांकि ज्यादातर राज्य में उम्मीदवारों के चयन के लिए प्राइमरी का आयोजन होता है।

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डोनाल्ड ट्रंप और जो बिडेन - फोटो : ANI
अब समझिए, प्राइमरी क्या है और इसमें क्या होता है?
कॉकस से अलग प्राइमरी का संचालन नियमित पोलिंग स्टेशन पर होता है। आम तौर पर इसके लिए भुगतान स्टेट करता है और संचालन राज्य निर्वाचन अधिकारी करते हैं। वोटर्स सामान्य तौर पर गोपनीय बैलट के जरिए पसंद के उम्मीदवार को वोट करते हैं।

समान्य तौर पर प्राइमरी दो तरह की होती हैं- क्लोज्ड प्राइमरी जिसमें केवल पार्टी के रजिस्टर्ड वोटर्स हिस्सा लेते हैं। दूसरी है ओपन प्राइमरी। इसमें किसी भी पार्टी का सदस्य होना जरूरी नहीं है। 1970 के दशक के पहले ज्यादातर राज्यों में डेलिगेट्स का चुनाव कॉकस के जरिए होता था, लेकिन 1972 में सुधार के बाद नामांकन प्रक्रिया को ज्यादा समावेशी और पारदर्शी बनाया गया। इसके बाद ज्यादातर राज्यों ने प्राइमरी को अपना लिया।

2016 में केवल 14 राज्यों (अलास्का, कोलारैडो, हवाई, आइडहो, आयोवा, कैंजस, केन्टकी, मेईन, मिनासोटा, नर्बास्का, नेवाडा, नॉर्थ दकोटा, वॉशिंगटन और वॉयमिंग) के साथ डिस्ट्रिक्ट ऑफ कोलंबिया और चार यूएस इलाके (अमेरिकन समोआ, नॉर्दन मरिआना, पुअर्तो रिको और यूएस वर्जिन आईलैंड्स) में कॉकस का आयोजन किया गया।

आयोवा कॉकस क्यों और किस वजह से अहम है?
1970 के दशक में कई ऐसी घटनाएं हुईं जिससे आयोवा कॉकस को राजनीतिक तौर पर और भी ज्यादा अहमियत हासिल हुई। पहला, शिकागो में 1968 के नेशनल कन्वेंशन के बाद डेमोक्रेटिक पार्टी ने सुधार प्रक्रिया शुरू की थी।

उन दिनों युद्ध विरोधी प्रदर्शनकारी हिंसक हो गए थे। पार्टी आलाकमान की शक्ति को सीमित करने की प्रक्रिया शुरू हुई और नियमित सदस्यों के बीच नॉमिनेशन प्रक्रिया को ज्यादा पारदर्शी बनाया गया। अन्य मामलों में डेलिगेट्स की चयन प्रक्रिया को समयबद्ध किया गया। 1972 में आयोवा में कॉकस मार्च या अप्रैल में होता था, जो अब न्यू हैंपशायर से ठीक पहले जनवरी में होता है।

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डोनाल्ड ट्रंप-जो बिडेन (फाइल फोटो) - फोटो : PTI
प्राइमरी और कॉकस में कितने फीसदी लोग भाग लेते हैं?
आम तौर पर प्राइमरी के मुकाबले कॉकस में कम लोग भाग लेते हैं। 2012 में आयोवा में रिपब्लिकन पार्टी के लिए केवल 6.5 फीसदी मतदाता ही कॉकस में शरीक हुए थे जबकि यहां 20 फीसदी पंजीकृत रिपब्लिकन हैं। 2016 में जब दोनों पार्टियों ने कैंपेन चलाया तो 16 फीसदी लोग पहुंचे। न्यू हैंपशायर में टर्नआउट 31 फीसदी रहा।

डेलिगेट्स कौन होते हैं?
डेलिगेट्स अक्सर पार्टी कार्यकर्ता, स्थानीय नेता या उम्मीदवार के शुरुआती समर्थक बनते हैं। इसके साथ ही डेलिगेट्स प्रचार अभियान संचालक समिति के सदस्य और पार्टी के लंबे समय से सक्रिय सदस्यों को भी बनाया जाता है।

डेलिगेट्स कैसे जीतते हैं उम्मीदवार?
डेमोक्रेटिक पार्टी में उम्मीदवार को सामान्यतः आनुपातिक आधार पर डेलिगेट्स मिलते हैं। उदाहरण के लिए एक कैंडिडेट को प्राइमरी या कॉकस में एक तिहाई वोट या समर्थन मिला तो उसके हिस्से में एक तिहाई डेलिगेट्स आएंगे। रिपब्लिकन पार्टी में नियम अलग हैं। कुछ राज्यों में डेलिगेट्स आनुपातिक आधार पर मिलते हैं और कुछ राज्यों में विजयी उम्मीदवार को सारे डेलिगेट्स मिल जाते हैं।

2016 में रिपब्लिकन पार्टी के ऐसे 10 राज्य थे। अन्य राज्यों में मिलेजुले तरीके अपनाए जाते हैं। इससे पहले आयोवा कॉकस में कोई डेलिगेट हासिल नहीं होता था। इसमें केवल पार्टी के वफादारों के समर्थन को परखा जाता था, लेकिन 2016 में नियम बदल दिया गया।

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अमेरिकी राष्ट्रपति चुनाव - फोटो : iStock
कितने डेलिगेट्स हासिल करने की जरूरत पड़ती है?
हर राज्य में डेमोक्रेटिक वोटर्स की संख्या के आधार पर डेलिगेट्स का आवंटन किया जाता है। 2016 में डेमोक्रेटिक उम्मीदवार को कुल 4,763 में से 2,382 डेलिगेट्स पार्टी का आधिकारिक उम्मीदवार बनने के लिए जीतने थे। 

दूसरी तरफ रिपब्लिकन पार्टी में उम्मीदवार बनने के लिए कुल 2,472 डेलिगेट्स में से 1,237 डेलिगेट्स जीतने होते हैं। रिपब्लिकन पार्टी ने सभी राज्यों में 10-10 डेलिगेट्स तय किए हुए हैं। इसके साथ ही तीन सभी कांग्रेसनल डिस्ट्रिक्ट में और पूर्ववर्ती राष्ट्रपति चुनाव में पार्टी के इलेक्टोरल वोट्स के आधार पर भी राज्यों में डेलिगेट्स का निर्धारण होता है।

राष्ट्रपति चुनाव में आखिर कौन होते हैं सुपरडेलिगेट्स?
दोनों पार्टियां डेलिगेट्स की एक खास संख्या अपने पास सुरक्षित रखती हैं। ये सामान्य तौर पर नेशनल कन्वेंशन में किसी को समर्थन करने के लिए बाध्य नहीं होते हैं। रिपब्लिकन पार्टी में सुपरडेलिगेट्स सभी स्टेट की नेशनल कमेटी में तीन-तीन हैं। 2016 में कुल डेलिगेट्स के ये सात फीसदी थे। 

डेमोक्रेटिक पार्टी में सुपरडेलिगेट्स में न केवल नेशनल कमेटी के सदस्य को शामिल किया जाता है बल्कि कांग्रेस के सभी सदस्यों, गवर्नर, पूर्व राष्ट्रपति और उपराष्ट्रपति के साथ सीनेट और हाउस के पूर्व नेता के अलावा डेमोक्रेटिक नेशनल कमेटी के अध्यक्ष भी शामिल होते हैं। 2016 में डेमोक्रेटिक पार्टी में कुल डेलिगेट्स के 15 फीसदी सुपरडेलिगेट्स हैं।

डेमोक्रेटिक पार्टी के सुपरडेलिगेट्स की ओर साल 2008 की प्रेसिडेंशल प्राइमरी में मीडिया का ध्यान खूब आकर्षित हुआ था। तब सीनेटर बराक ओबामा और सीनेटर हिलेरी क्लिंटन के बीच नॉमिनेशन के लिए बेहद कड़ा मुकाबला जून महीने तक चला था। तब ज्यादातर लोगों का मानना था कि कुल डेलिगेट्स के 20 फीसदी सुपरडेलिगेट्स ही उम्मीदवार का फैसला करेंगे।

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डोनाल्ड ट्रंप - फोटो : सोशल मीडिया
निर्दलीय मतदाता क्या भूमिका निभाते हैं?
निर्दलीय मतदाता किसी पार्टी से बंधे नहीं होते हैं। ये किसी समूह के रूप में काम नहीं करते हैं। हालांकि कथित रूप से कई राज्य ओपन प्राइमरी का आयोजन करते हैं और इसमें निर्दलीय मतदाता हिस्सा ले सकते हैं।

कुछ राज्यों में तो चुनाव से पहले पार्टी छोड़ने की भी आजादी होती है। ऐसे में निर्दलीय अपनी निष्ठा रिपब्लिकन या डेमोक्रेटिक पार्टी के साथ जता सकते हैं। तीसरी पार्टी जैसे ग्रीन पार्टी डेलिगेट्स हासिल कर सकती है, लेकिन तीसरी पार्टी शायद ही बड़ी संख्या में प्राइमरी वोट हासिल करती है, ऐसे में इसका कोई खास मतलब नहीं रह जाता।

नेशनल कन्वेंशन में क्या होता है?
हाल के दशकों में नेशनल कन्वेंशन केवल दस्तूर की तरह रह गया है। इसमें सामान्य तौर पर उस उम्मीदवार की आधिकारिक रूप से पुष्टि की जाती है, जिसने पहले पर्याप्त डेलिगेट्स जीत लिए हैं। इस स्थिति में यह सामान्य तौर पर मीडिया इवेंट की तरह हो जाता है, जिसमें पार्टी की नीति, राष्ट्रपति और उपराष्ट्रपति पद के उम्मीदवार की घोषणा की जाती है।

हालांकि ऐसे भी उदाहरण हैं जब पार्टी उम्मीदवार का चयन प्राइमरी या कॉकस में नहीं हो पाया और इसका फैसला नेशनल कन्वेंशन में हुआ। आखिरी बार यह 1952 में हुआ था, जब नेशनल कन्वेंशन में कई राउंड की वोटिंग के बाद उम्मीदवार का चयन किया गया।

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जो बिडेन (फाइल फोटो) - फोटो : PTI
उम्मीदवारों की घोषणा के बाद क्या?
अमेरिका में राष्ट्रपति पद के लिए चुनाव का असली तामझाम रिपब्लिकन पार्टी और डेमोक्रेटिक पार्टी की तरफ के औपचारिक रूप से उम्मीदवारों की घोषणा के बाद शुरू होता है। यह गर्मी के मौसम के अंत के साथ शुरू होता है। दोनों कैंडिडेट देशभर में अपने एजेंडे के साथ एक दूसरे पर तीखे हमले करते हैं।

वोटिंग के 6 हफ्ते पहले दोनों कैंडिडेट्स के बीच टीवी पर राष्ट्रपति पद के लिए तीन बार बहस होती है। जो उम्मीदवार सभी राज्यों में सबसे ज्यादा वोट हासिल करता है वह राष्ट्रपति बनता है। अमेरिका के चुनाव में इलेक्टोरल कॉलेज सिस्टम बेहद अहम है। यह लोगों का समूह होता है जो 538 इलेक्टर्स को चुनता है। जिसे 270 इलेक्टर्स का समर्थन मिल जाता है, वह अमेरिका का अगला राष्ट्रपति बनता है।

लेकिन सभी राज्य समान नहीं हैं। उदाहरण के लिए कैलिफोर्निया की आबादी कोनेटिकेट से 10 गुना ज्यादा है, ऐसे में दोनों राज्यों में इलेक्टर्स समान नहीं होंगे। सबसे हाल की जनगणना के मुताबिक जितनी आबादी होती है उसी के आधार पर प्रत्येक राज्य में निश्चित संख्या में इलेक्टर्स होते हैं।

जब नागरिक अपने पसंदीदा उम्मीदवार को वोट कर रहे होते हैं तो वे दरअसल, इलेक्टर्स को वोट देते हैं। ये इलेक्टर्स अपने-अपने प्रत्याशी के प्रति निष्ठा जाहिर करते हैं। कुछ राज्यों में मामला दिलचस्प है। नर्बास्का और मेईन को छोड़कर लगभग सभी राज्यों में जीतने पर सारे इलेक्टर्स मिल जाते हैं। यदि कोई न्यूयॉर्क में सभी चुनाव जीतता है तो उसे सभी 29 इलेक्टर्स मिलेंगे। इसी रेस में 270 का आंकड़ा छूना होता है। ऐसे में स्विंग स्टेट काफी मायने रखते हैं।

क्या हैं ये स्विंग स्टेट्स?
दो कैंडिडेट्स के मैदान में आ जाने के बाद 270 इलेक्टर्स पाने की रेस सभी राज्यों में शुरू होती है। दोनों पार्टियां सोचती हैं कि वे कम से कम कुछ खास बड़े या छोटे राज्यों को अपने नियंत्रण में रखें। रिपब्लिकन पार्टी को टेक्सास में बहुत कैंपेन की जरूरत नहीं पड़ती। ये यहां ज्यादा वक्त नहीं देते क्योंकि वोटर्स पहले से ही इस पार्टी के पक्ष में होते हैं।

उसी तरह कैलिफोर्निया में डेमोक्रेटिक पार्टी को बहुत मेहनत नहीं करनी पड़ती है। फ्लोरिडा में 29 इलेक्टर्स हैं। साल 2000 के इलेक्शन में फ्लोरिडा का खास रोल रहा था। फ्लोरिडा जॉर्ज डब्ल्यू बुश के पक्ष में गया था। बुश राष्ट्रीय स्तर पर लोकप्रिय वोट हासिल करने में नाकाम रहे थे, लेकिन सुप्रीम कोर्ट में केस बाद उन्होंने इलेक्टोरल कॉलेज जीत लिया था।

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US election - फोटो : iStock
क्या है इलेक्टोरल कॉलेज?
इलेक्टोरल कॉलेज के जरिए 538 इलेक्टर्स को चुना जाता है। ये इलेक्टर्स ही अमेरिका के राष्ट्रपति और उपराष्ट्रपति का फैसला करते हैं। जब वोटर्स वोट करने जाएंगे तो वे अपने पसंदीदा उम्मीदवार के इलेक्टर्स को अपने स्टेट में चुनेंगे। जो उम्मीदवार इलेक्टोरल वोट्स का बहुमत हासिल करेगा, वह अमेरिका का अगला राष्ट्रपति होगा। 538 इलेक्टर्स में 435 रिप्रेजेंटेटिव्स, 100 सीनेटर्स और तीन डिस्ट्रिक्ट ऑफ कोलंबिया के इलेक्टर्स होते हैं।

इलेक्टोरल कॉलेज आखिर कैसे काम करता है?
हर चार साल बाद अमेरिका के वोटर्स राष्ट्रपति और उपराष्ट्रपति के लिए वोट करते हैं। दो राज्यों में जो उम्मीदवार स्टेट वोट को बहुमत से हासिल करने में कामयाब रहता है वह स्टेट इलेक्टोरल जीत लेता है। नर्बास्का और मेईन में इलेक्टोरल वोट आनुपातिक प्रतिनिधित्व से निर्धारित होता है।

इसका मतलब यह हुआ कि इन दोनों राज्यों में सबसे ज्यादा वोट पाने वाले को दो इलेक्टोरल वोट मिलेंगे (दो सीनेटर्स) जबकि बाकी बचे इलेक्टोरल वोट कांग्रेसनल डिस्ट्रिक्ट को आवंटित कर दिए जाएंगे। इस नियम से दोनों उम्मीदवारों को नर्बास्का और मेईन में इलेक्टोरल वोट मिलने की संभावना रहती है, जबकि बाकी बचे 48 राज्यों में विजेता को सभी इलेक्टर्स मिल जाते हैं।

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जो बिडेन और कमला हैरिस - फोटो : joebiden.com
आखिर कैसे चुने जाते हैं इलेक्टर्स?
इनके चयन की प्रक्रिया राज्य दर राज्य बदलती रहती है। सामान्यतः राजनीतिक पार्टियां अपने स्टेट कन्वेंशन में इलेक्टर्स को नामांकित करती हैं। कई बार यह प्रक्रिया वोट के जरिए पार्टी सेंट्रल कमेटी में होती है। इलेक्टर्स सामान्यतः राज्यों के निर्वाचित अधिकारी, पार्टी नेता या राष्ट्रपति पद के उम्मीदवार से गहरे जुड़ाव वाले लोग होते हैं।

क्या इलेक्टर्स किसी को भी वोट कर सकते हैं?
इलेक्टर्स को न तो संविधान और न ही संघीय इलेक्शन कानून अपनी ही पार्टी के प्रत्याशी को वोट देने के लिए मजबूर कर सकता है। हालांकि 27 राज्यों में कानून है कि यदि उम्मीदवार को स्टेट का लोकप्रिय वोट बहुमत के साथ हासिल हो गया है तो आवश्यकता के मुताबिक इलेक्टर्स अपनी पार्टी के उम्मीदवार को वोट करेंगे। जबकि 24 अन्य राज्यों में यह कानून लागू नहीं होता है, लेकिन सामान्य तौर पर देखा जात है कि इलेक्टर्स अपनी पार्टी के कैंडिडेट को ही वोट करते हैं।
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अमेरिकी राष्ट्रपति चुनाव की प्रक्रिया - फोटो : USA.Gov
इलेक्टोरल कॉलेज में किसी को भी बहुमत न मिले तो क्या होगा?
यदि इलेक्टोरल कॉलेज में किसी को भी बहुमत हासिल नहीं होता है तो चुनाव अमेरिका के हाउस ऑफ रिप्रेजेंटेटिव्स के पास चला जाता है। हाउस ऑफ रिप्रेजेंटेटिव उन तीन दावेदारों को चुनता है जिसने ज्यादातर इलेक्टोरल वोट्स जीते हैं। इसके बाद हर राज्य को एक वोट का अधिकार दिया जाता है। जो भी ज्यादातर राज्यों का वोट हासिल करता है वह राष्ट्रपति बनता है। यही प्रक्रिया उपराष्ट्रपति पद के चुनाव के लिए भी अपनाई जाती है।

लोकप्रिय वोट खो देने पर भी क्या इलेक्टोरल कॉलेज जीता जा सकता है?
कोई उम्मीदवार लोकप्रिय वोट में हार का सामना कर इलेक्टोरल कॉलेज जीत सकता है। ऐसा 2000 में जॉर्ज डब्ल्यू बुश के साथ हुआ था। वह अलगोर के मुकाबले पॉप्युलर वोट में पिछड़ गए थे, लेकिन इलेक्टोरल वोट उन्हें 266 के मुकाबले 271 मिले थे।
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