काशी की खास पहचान है गुलाबी मीनाकारी। सोने चांदी से बनीं खूबसूरत हस्तकला। आभूषण हों या सजावटी सामान, गुलाबी मीनाकारी इन सबकी खूबसूरती में चार चांद लगा देती है। चंदन के तेल में सोने के बुरादे से की जाने वाली ये कारीगरी नायाब है। कभी इस कलाकारी में केवल पुरुष ही माहिर थे लेकिन अब इसमें महिलाओं ने भी अपनी मौजूदगी दर्ज करानी शुरू कर दी है। आगे की स्लाइड्स में देखें...
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- फोटो : अमर उजाला
ये इतर है कि गायघाट के 15 से 20 परिवार जहां इस कला को आगे बढ़ा रहे थे, वहीं अब ये पांच से छह परिवारों तक ही सिमट गया है लेकिन महिलाएं, युवतियां इसे लेकर आगे बढ़ रही हैं। काशी के इस खास शिल्प की चमक देशी-विदेशी पर्यटकों को लुभा रही है लेकिन इसे बनाने वाले कारीगरों ने अपनी आमदनी बढ़ाने के लिए इस कला से दूरी बना ली लेकिन इस गुलाबी हस्तशिल्प पर लुप्त होने का संकट अब खत्म हो रहा है क्योंकि इसकी डोर महिलाओं ने संभाल ली है।
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गुलाबी मीनाकारी के इतिहास में पहली बार इसमें महिलाओं की दस्तक बढ़ी है। अब तो लड़कियां पढ़ाई के साथ ये हुनर सीख कर न सिर्फ अपना और अपने परिवार का सहयोग कर रही हैं बल्कि बनारस की अनूठी कला को संजो भी रही हैं।
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मीनाकारी सीख रहीं विद्यापीठ से एमए कर रही छात्रा रौशनी वर्मा ने बताया कि इस शिल्प में मेहनत बहुत है। कई बार मीनाकारी के लिए लगाई जाने वाली परत से हाथ जल जाता है क्योंकि इसे गर्म ही लगाना होता है। मेहनत बहुत थी और आमदनी कम, इसलिए हमारे बाबा दादा ने इसे छोड़ दिया लेकिन हम इसे फिर अपना रहे हैं।
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बीकॉम कर रहीं निकिता सिंह ने बताया कि नई चीज सीखना अच्छा लगता है। इस कला में पारंगत होकर इसे दूसरी महिलाओं को सिखाऊंगी। गृहिणी अंजू वर्मा कहती हैं कि इस हुनर को सीखने के बाद इस अनोखी कला को आत्मसात कर दुनिया के सामने दिखाना चाहती हूं।
गुलाबी मीनाकारी के कारीगर कुंज बिहारी बताते हैं कि चंदन के तेल में सोने के बुरादे से शिल्प का रंग तैयार किया जाता है। इसका पूरा काम चांदी पर होता है। 1200 डिग्री तापमान पर अलग-अलग सांचों को पकाया जाता है। अलग अलग भाग को बनाने के बाद फिर उसे जोड़ा जाता है। 400 साल पहले मुगल काल में ये कला विकसित हुई थी।