शिव की नगर काशी में गंगा घाटों की सीढ़ियों पर जगमगाते दीप, रंग बिरंगी झालरों से की गई सजावट, भजन-कीर्तन, आतिशबाजी, रंगोली देखकर ऐसा लग रहा है मानों स्वर्ग जमीं पर उतर आया हो। आगे की स्लाइड्स में देखें...
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- फोटो : amar ujala
देव दीपावली पर घाट दीपों से जगमगा उठा। अस्सी घाट से लेकर तुलसीघाट, राणा महल घाट सहित हर तरफ हर-हर महादेव की गूंज के साथ ही गंगे मइया की जय सुनाई दे रही थी। शुक्रवार को घाटों पर बच्चों, बड़ों, महिलाओं ने सबने आतिशबाजी कर देव दीपावली मनाया।
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दशाश्वमेध घाट पर गंगा आरती के दौरान यह अनुपम नजारा कैद करने के लिए देसी और विदेशी सैलानियों के कैमरे गंगा की लहरों पर चमकते नजर आए तो गंगा की लहरों पर सवार नौका और बजड़ों से नदी में ट्रैफिक जाम सरीखा नजारा भी दिखा।
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शाम से ही गंगा घाटों पर दीपों का चंद्रहार दिख रहा है। कहीं सुरों की खनक तो कहीं पटाखों की धमक सनाई दे रही है। घाट से लेकर गंगा की लहरों तक फूलों की महक के साथ इंद्रधनुषी अलौकिक छठा देखने को मिल रही है।
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पूर्णिमा की शाम जैसे जैसे गहरा रही है बनारस के सभी 84 घाटों सहित 36 कुंडों की रौनक देखते बन रही है। काशी में सिर्फ घाट ही नहीं बल्कि मकानों, दुकानों और सड़कों पर भी लोग दीप जलाकर देवी देवताओं का स्वागत कर रहे हैं। शाम के साथ साथ ही यहां का नजारा अलौकिक होने लगा है।
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देव दीपावली को भव्य और ऐतिहासिक बनाने के लिए इस बार घाटों पर विशेष आयोजन किए जा रहे हैं। राजघाट से अस्सी के बीच दीपों की जगमगाहट के साथ ही काशी की धर्म, कला और संस्कृति भी झलक भी देखने को मिल रही है। इसके लिए संस्कृति विभाग और पर्यटन विभाग ने खास तैयारियां की हैं।
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16 घाटों पर संस्कृति विभाग की ओर से एकल और समूह नृत्य का आयोजन किया जा रहा है। इस बार सबसे खास बात यह है प्रशासन गंगा के दूसरी तरफ भी दीप दीपावली का आयोजन कर रहा है। प्रदेश के अलग अलग शहरों से जुड़ी पंरपंराओं से जुड़े सांस्कृतिक कार्यक्रम के साथ ही काशी के नृत्य और संगीत की झलक दिखाई दे रही है।
1986 में पूर्व काशी नरेश स्व. डॉ. विभूति नारायण सिंह ने पंचगंगा पर हजारा दीप जलाकर देव दीपावली की शुरुआत कराई थी। प्राचीन दशाश्वमेध घाट पर सबसे पहले आरती की शुरुआत 1991 से हुई है। 14 नवंबर, 1997 से गंगा आरती प्रतिदिन की जाने लगी।