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सुभासपा ने रैली करके दिखाया जनाधार, अपनी ही सरकार के खिलाफ पलटवार की दी चेतावनी

Mon, 25 Feb 2019 08:19 PM IST
Sayali Maurya प्रदीप मिश्र,अमर उजाला,वाराणसी
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omprakash rajbhar - फोटो : amar ujala
लंबे अरसे से अपनी ही सरकार (भाजपा) के खिलाफ हमलावर सुभासपा अध्यक्ष ओमप्रकाश राजभर ने रविवार को अति दलित-अति पिछड़ा रैली में भारी भीड़ जुटाकर यह साबित कर दिया कि अभी भी पूर्वांचल में उनका जनाधार कम नहीं है। वे अगर अकेले लड़े तो 2018 के लोकसभा चुनाव में बड़े दलों का चुनावी समीकरण बिगाड़ सकते हैं। बहरहाल, राजभर को साथ रखना भाजपा की सियासी मजबूरी है वहीं, सुभासपा अध्यक्ष की ओर से भी ऐसे संकेत फिलहाल नहीं मिले हैं जिनसे यह माना जाए कि वे एनडीए से अगल हो रहे हैं। देखें आगे की स्लाइड्स में...
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omprakash rajbhar - फोटो : amar ujala
अब सबकी नजर 26 फरवरी को भाजपा अध्यक्ष अमित शाह से उनकी मुलाकात पर है, जिसके बाद सूबे के सियासी परिदृश्य में बदलाव दिख सकता है। एक बात तो तय है कि सुभासपा अध्यक्ष की नजर 2019 नहीं बल्कि 2022 पर है, जब सूबे में विधानसभा के चुनाव होंगे। पार्टी अगले चुनाव के लिए इतनी मजबूत जमीन तैयार करना चाहती है कि 2022 में सभी दल उससे तालमेल के लिए मजबूर हो जाएं। 
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omprakash rajbhar - फोटो : amar ujala
महारैली में जुटी भीड़ के जरिए राजभर ने पूर्वांचल में गठबंधन के लिए अपनी अपरिहार्यता साबित करने के साथ ही यह भी जताया कि उनका सामाजिक न्याय कमेटी की रिपोर्ट के आधार पर पिछड़ों को दिए जा रहे आरक्षण में बंटवारे की मांग जायज है। पार्टी 27 प्रतिशत आरक्षण में सर्वाधिक पिछड़ी जातियों के लिए 11, अति पिछड़ी जातियों के लिए नौ और पिछड़ी जातियों के लिए सात फीसदी आरक्षण की सीमा निर्धारित करना चाहती है। 

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omprakash rajbhar - फोटो : amar ujala
पार्टी का तर्क है कि 2017 के विधानसभा चुनाव में भाजपा से समझौता इसीलिए हुआ था। प्रदेश में पिछड़ों में करीब 50 जातियां हैं और 56 प्रतिशत पिछड़े हैं। सभी जातियों को आरक्षण का लाभ नहीं मिल पा रहा है। पार्टी के प्रदेश महासचिव शशि प्रताप सिंह कहते हैं कि आरक्षण के बंटवारे पर उन्हें कोरे आश्वासन नहीं चाहिए। यदि ऊंची जातियों के गरीबों को 48 घंटे में आरक्षण दिया जा सकता है तो पिछड़ों के आरक्षण के लिए तो पर्याप्त आधार हैं। 
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omprakash rajbhar - फोटो : amar ujala
अति पिछड़ों और सर्वाधिक पिछड़ों को मुख्यधारा का हिस्सा बनाने के लिए यह फैसला मील का पत्थर साबित होगा। दरअसल, लोकसभा चुनाव से पहले भाजपा पर दबाव बनाने के पीछे सुभासपा का मकसद 2022 का विधानसभा चुनाव है। भाजपा से गठबंधन कर सुभासपा ने 2017 में आठ सीटों पर चुनाव लड़ा था। चार सीटों पर जीती थी। ओमप्रकाश राजभर कैबिनेट मंत्री हैं। लोकसभा चुनाव लड़ने में सुभासपा की दिलचस्पी बहुत नहीं है। 
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ओम प्रकाश राजभर - फोटो : amar ujala
पूर्वांचल में करीब एक दर्जन सीटों पर राजभर का खासा प्रभाव है। भाजपा ने अनिल राजभर को मंत्री और सकलदीप राजभर को राज्यसभा में भेजकर ओमप्रकाश का असर कम करने की कोशिश की लेकिन बिरादरी के बीच ओमप्रकाश की छवि जुझारू और उनके हक के लिए कोई समझौता न करने वाले नेता की बन गई है। इसीलिए राजभर पार्टी को एकजुट रखने में जुटे हैं। मालूम है कि सरकार में शामिल रहकर विरोध का मतलब होता है। इसीलिए माना जा रहा है कि सुभासपा 2019 के लोकसभा चुनाव में भाजपा के साथ गठबंधन बरकरार रखेगी।
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