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कारगिल विजय दिवस: किसी ने बर्फ का पानी पीया, किसी को लगी गोली; 27 साल पहले के कारगिल को काशी में बैठ किया याद

Sun, 26 Jul 2026 11:42 AM IST
Aman Vishwakarma अमर उजाला नेटवर्क, वाराणसी।

सार

Kargil Vijay Diwas 2026: कारगिल विजय दिवस पर काशी में पूर्व सैनिकों ने 27 वर्ष पुराने युद्ध के अनुभव साझा किए। उन्होंने बताया कि दुर्गम पहाड़ों पर एक सप्ताह तक भूखे रहकर पाकिस्तानी सेना का मुकाबला किया। कई जवानों ने केवल बर्फ का पानी पीकर ड्यूटी निभाई, जबकि कई गोलियां लगने के बावजूद मोर्चे पर डटे रहे और देश की रक्षा की।
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कारगिल विजय दिवस। - फोटो : अमर उजाला
Varanasi News: कारगिल के दुर्गम पहाड़ों पर 21 हजार फीट की ऊंचाई पर मौत से आंखें मिलाने वाले बनारस के वीरों की दास्तान सिर्फ शहादत और शौर्य की कहानी नहीं बल्कि सिस्टम की बेरुखी के खिलाफ एक अधूरी लड़ाई भी है। बर्फानी चोटियों पर दुश्मन को मात देने वाले इन रणबांकुरों ने देश की रक्षा तो कर ली, लेकिन 27 साल बाद भी वे अपने हक के लिए सिस्टम से लड़ रहे हैं। एक ही परिवार के चार भाइयों की वीरता हो या जुबार हिल पर तिरंगा फहराने वाले जांबाजों का साहस, देश ने उन्हें सलाम किया।

बलिया के युवक भृगु बाबा की जय, गाजीपुर के जय मां कामाख्या और चंदौली के युवक करते हैं जय कीनाराम का उद्घोष: सेना भर्ती के लिए पूर्वांचल के युवकों के जोश का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि हर साल एक लाख से अधिक युवक देश सेवा के लिए आवेदन करते हैं। इनमें सबसे अधिक संख्या गाजीपुर, बलिया, गोरखपुर और चंदौली के युवकों की होती है। भर्ती में शामिल होने के दौरान बलिया के युवक ‘भृगु बाबा की जय’, गाजीपुर के युवक ‘जय मां कामाख्या’ और चंदौली के युवक ‘जय कीनाराम’ के उद्घोष के साथ मैदान में उतरते हैं।
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आलीम अली। - फोटो : संवाद
खाई में गिरे, घर पर अंतिम संस्कार की तैयारी चल रही थी 18 दिन बाद आलीम अली के जिंदा होने की जानकारी मिली
चिरईगांव। चौबेपुर थाना क्षेत्र के सरसौल निवासी कारगिल योद्धा नायक आलीम अली ने वर्ष 1999 के कारगिल युद्ध में जुबार हिल पर पाकिस्तान सेना से लोहा लिया था। गंभीर रूप से घायल होने के बावजूद उन्होंने मोर्चा नहीं छोड़ा। आज, 27 साल बाद भी वे सरकार की ओर से किए गए पांच बीघा जमीन देने के वादे के पूरा होने का इंतजार कर रहे हैं। आलीम अली नवंबर 1990 में सेना में भर्ती हुए थे। 

वर्ष 1999 में कारगिल युद्ध के दौरान मेजर अजीत सिंह के नेतृत्व में 21 हजार फीट की ऊंचाई पर स्थित जुबार हिल पर पहुंचे। जवानों ने दुश्मन की चौकियों पर धावा बोला। भोर होते ही पाकिस्तानी नॉर्दर्न लाइट इन्फेंट्री ने जवाबी हमला कर दिया। भीषण गोलीबारी के बीच आलीम अली ने अकेले 10 पाकिस्तानी सैनिकों को मार गिराया। जवाबी कार्रवाई में उनके कई साथी शहीद हो गए। उनके हाथ, पैर और चेहरे पर गोलियां व ग्रेनेड के छर्रे लगे। 

गोलीबारी के दौरान वह करीब 100 मीटर गहरी खाई में जा गिरे। युद्ध के दौरान सेना की ओर से उनके परिजनों को भी शहीद होने की सूचना दे दी गई। घर पर अंतिम संस्कार की तैयारियां शुरू हो गई थीं, लेकिन घटना के 18 दिन बाद आलीम अली ने एक साथी के घर फोन कर अपने जीवित होने की जानकारी दी। इसके बाद उनका छह महीने तक इलाज चला। 
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रितेश शर्मा। - फोटो : संवाद
चार आतंकी मार गिराए, 200 मीटर गहरी खाई में गिरकर हुए बलिदान
वाराणसी। बीएचयू के पूर्व छात्र मेजर रितेश शर्मा ने कारगिल युद्ध में अदम्य साहस का परिचय देते हुए टाइगर हिल के पश्चिमी छोर को दुश्मनों से मुक्त कराने में अहम भूमिका निभाई थी। कारगिल युद्ध के दौरान उन्होंने प्वाइंट 4875, टाइगर हिल के पश्चिमी छोर और मश्कोह घाटी में मोर्चा संभालते हुए युद्ध लड़ा। युद्ध के बाद जम्मू-कश्मीर के कुपवाड़ा में आतंकियों के खिलाफ चलाए गए अभियान में उन्होंने चार आतंकियों को मार गिराया। 

अभियान के दौरान गोली लगने से वह करीब 200 मीटर गहरी खाई में गिरकर गंभीर रूप से घायल हो गए। लंबे समय तक कोमा में रहने के बाद 6 अक्टूबर 1999 को उन्होंने वीरगति प्राप्त की। 27 अक्तूबर 1973 को अलीगढ़ में जन्मे मेजर रितेश शर्मा ने बदायूं और बरेली से प्रारंभिक शिक्षा प्राप्त की। इसके बाद लखनऊ के ला मार्टिनियर कॉलेज से इंटरमीडिएट और बीएचयू से बीकॉम की पढ़ाई पूरी की। सीडीएस परीक्षा उत्तीर्ण करने के बाद उन्होंने आईएमए, देहरादून से सैन्य प्रशिक्षण प्राप्त किया और वर्ष 1995 में 17 जाट रेजिमेंट में कमीशन प्राप्त किया। संवाद

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लाल बिहारी पटेल। - फोटो : संवाद
जमीन में छिपाए बारूदी सुरंग, विस्फोटक हटाए, युद्ध के बाद प्रधान बने
रोहनिया। आराजी लाइन विकासखंड के बैरवन बड़ापुरा गांव निवासी पूर्व सैनिक लाल बिहारी पटेल कारगिल युद्ध की यादों को आज भी नहीं भूल पाए हैं। सेना की 53 इंजीनियरिंग रेजिमेंट और 22 आरआर की ओर से कारगिल युद्ध में शामिल रहे। उनकी आंखों के सामने ही उनकी यूनिट के साथी सुखचैन सिंह लड़ाई में शहीद हो गए। उनकी यूनिट की जिम्मेदारी दुश्मन द्वारा जमीन के भीतर छिपाए गए बारूदी सुरंगों और विस्फोटकों की जांच कर सेना के आगे बढ़ने के लिए रास्ता सुरक्षित करना था। लाल बिहारी पटेल वर्ष 2010 में बैरवन गांव के ग्राम प्रधान रहे। 
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सूबेदार यादव। - फोटो : संवाद
एक सप्ताह तक भूखे रहकर लड़ी कारगिल की लड़ाई
चाैबेपुर। थाना क्षेत्र के नारायनपुर गांव निवासी सूबेदार यादव भी डटे रहे। वर्ष 1987 में भारतीय सेना में सिपाही के पद पर भर्ती हुए थे। वर्ष 1999 के कारगिल युद्ध के दौरान उनकी तैनाती भी जुबार हिल पर थी। दुर्गम पहाड़ियों पर उन्होंने एक सप्ताह तक भूखे रहकर और बर्फ का पानी पीकर पाकिस्तानी सेना का मुकाबला किया। दुश्मन के हमले में हुए विस्फोट से उनके हाथ और कमर में गंभीर चोटें आईं। 

उन्होंने बताया कि गाजीपुर के पंडितपुर निवासी उनके साथी जयप्रकाश यादव विस्फोट में दोनों पैर गंवा बैठे थे। वह लगातार पानी मांग रहे थे, लेकिन स्वयं घायल होने के कारण वह चाहकर भी उनके पास नहीं पहुंच सके। कुछ ही देर बाद जयप्रकाश यादव वीरगति को प्राप्त हो गए। घायल होने के बाद महीनों इलाज चला। सरकार की ओर से उन्हें पांच बीघा जमीन देने का आश्वासन दिया गया था, लेकिन 27 साल बाद भी यह वादा पूरा नहीं हुआ। वर्तमान में उनकी दो बेटियों की शादी हो चुकी है, जबकि दो बेटे नौकरी की तैयारी कर रहे हैं। परिवार के भरण-पोषण के लिए वह डुबकियां पावर हाउस में सिक्योरिटी गार्ड के रूप में कार्यरत हैं। 
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किशन यादव। - फोटो : संवाद
घायल हुए लेकिन बटालियन ने पोस्ट पर कब्जा किया
रोहनिया में आराजी लाइन विकासखंड के आम सभा दरेखू निवासी किशन यादव कारगिल युद्ध के योद्धा रहे हैं। 22 ग्रेनेडियर रेजिमेंट में नायक के पद पर तैनात रहते हुए उन्होंने कारगिल की दुर्गम पहाड़ियों पर दुश्मन से लोहा लिया था। वर्तमान में वह काशी हिंदू विश्वविद्यालय (बीएचयू) में सुरक्षा कर्मी के रूप में सेवाएं दे रहे हैं। किशन यादव बताते हैं कि कारगिल युद्ध के दौरान उनकी तैनाती जुबार हिल पर थी। दिन में उन्हें पहाड़ी पर चढ़ाई करने का आदेश मिला। 

जवानों ने जैसे ही आगे बढ़ना शुरू किया, दुश्मन की ओर से भारी गोलाबारी शुरू हो गई। जवानों ने पहाड़ी की आड़ लेकर खुद को सुरक्षित रखा। अंधेरा होने पर उन्हें नीचे लौटना पड़ा। अगली रात जवानों ने फिर चढ़ाई शुरू की और दुश्मन को खदेड़कर पहाड़ी पर कब्जा कर लिया। युद्ध के दौरान बम का स्प्लिंटर हाथ में लगने से उनकी एक अंगुली क्षतिग्रस्त हो गई। किशन यादव के परिवार में पत्नी सितारा देवी, दो बेटे विजय प्रताप यादव और भानु प्रताप यादव तथा दो बेटियां बेबी यादव और प्रीति यादव हैं। 
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मंशा उपाध्याय। - फोटो : संवाद
चार भाईयों ने लड़ी जंग, अब कोई सुरक्षा गार्ड तो कोई डाक विभाग में
चौबेपुर क्षेत्र के अजांव गांव निवासी चार सगे भाइयों ने वर्ष 1999 के कारगिल युद्ध के दौरान देश की सीमाओं पर मोर्चा संभाला था। युद्ध शुरू होते ही उनकी छुट्टियां रद्द कर दी गई थीं। ऐसे में चारों भाइयों की तैनाती अलग-अलग स्थानों पर थी। गोलियों की बौछार के बीच जवाबी कार्रवाई करते समय उनके मन में सिर्फ एक ही संकल्प था कि हर हाल में यह जंग जीतनी है। चार भाइयों में सबसे बड़े मृत्युंजय उपाध्याय उस समय जम्मू बॉर्डर पर एएससी कोर में हवलदार के पद पर तैनात थे।

दूसरे भाई मंशा उपाध्याय जम्मू-कश्मीर में एएससी में हवलदार के पद पर तैनात थे। तीसरे भाई दिनेश उपाध्याय असम में नायक के पद पर तैनात थे, जबकि चौथे भाई विनोद कुमार उपाध्याय लेह में सिपाही के पद पर तैनात थे। वर्तमान में मृत्युंजय उपाध्याय घर पर हैं। मंशा उपाध्याय उगापुर विद्युत उपकेंद्र पर सुरक्षा गार्ड के रूप में कार्यरत हैं। उनके तीन बेटे हैं। इनमें एक सेना से सेवानिवृत्त हो चुका है, जबकि दो बेटे आज भी सेना में तैनात हैं। एक जम्मू-कश्मीर और दूसरा कर्नाटक के बंगलूरू में सेवा दे रहा है।
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कारगिल विजय दिवस। - फोटो : अमर उजाला
कारगिल युद्ध के दौरान सेना को ऊंचाई वाले क्षेत्रों में दुश्मन की सटीक स्थिति का पता लगाने के लिए सीमित सैटेलाइट इमेजरी और निगरानी संसाधनों पर निर्भर रहना पड़ता था। ड्रोन और आधुनिक निगरानी तकनीक भी आज की तुलना में बेहद सीमित थी। संचार व्यवस्था में भी कई कमियां सामने आई थीं। आज भारतीय सेना के पास उन्नत ड्रोन, सैटेलाइट आधारित निगरानी प्रणाली, थर्मल इमेजर, नाइट विजन उपकरण, आधुनिक रडार और इलेक्ट्रॉनिक युद्ध प्रणाली जैसी अत्याधुनिक तकनीकें हैं। कारगिल युद्ध के दौरान जवानों के अदम्य साहस के साथ बोफोर्स हॉवित्जर तोपों ने भी निर्णायक भूमिका निभाई थी। - कर्नल शैलेष, सेना भर्ती निदेशक
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