पद्मश्री प्रो. राजेश्वर आचार्य
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पद्मश्री प्रो. राजेश्वर आचार्य का कहना है कि शिव की नगरी काशी में होली का एक अलग ही रंग नजर आता है। यहां नाथ से, भस्म से, भभूत से, रेत से और प्रेत से होली खेली जाती है। रंग-भंग, गारी और लोक संगीत की जुगलबंदी वाले शहर की होली का आकर्षण हर किसी को बांध ही लेता है। जहां गाली भी लगे खुशियों की धुन 'गा ली' तब यहां होती है होली। उन्होंने कहा कि होली ही एक ऐसा त्योहार जब लोग खुलकर मिलते हैं। गाली देकर भी प्रसन्न करने की अभिलाषा होती है। गाली भी मजा देती है। कुंठाएं निकल जाती हैं। होली में शरीर ही नहीं मन भी इंद्रधनुषी हो जाता है। मुस्कराहट के साथ रस से भरी गाली और मर्यादित हुल्लड़बाजी बनारस में ही संभव है। यहां होली में हंसी-ठिठोली के साथ गाली दुर्भावना नहीं, अपनत्व को दर्शाती है। जो आज के युवाओं को भी अपनानी चाहिए।